दानपेटी से आगे बढ़ें: मंदिरों में चढ़ावे के साथ अब किसी गरीब का जीवन संवारने का लें संकल्प
भारत में आस्था और दान का गहरा नाता है। लेकिन क्या हमारा दान सिर्फ मंदिरों की गुप्त दानपेटियों तक ही सीमित रहना चाहिए? जानिए कैसे एक छोटा सा सही संकल्प किसी मजबूर के जीवन में उजाला ला सकता है।
मंदिर की दानपेटी से आगे बढ़ने का वक्त
नर सेवा को ही नारायण सेवा मानना जरूरी
धार्मिक चढ़ावे में पूरी पारदर्शिता की बड़ी मांग
बेसहारा और जरूरतमंदों की मदद ही सच्ची पूजा
हमारा प्यारा भारत देश अटूट आस्था और गहरे विश्वास की भूमि है। यहाँ धर्म केवल सुबह-शाम हाथ जोड़कर पूजा-पाठ करने का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन जीने की एक सुंदर शैली है। इंसान के जन्म से लेकर उसकी आखिरी सांस तक, हमारा पूरा जीवन किसी न किसी रूप में धर्म और अध्यात्म से जुड़ा रहता है। जब भी कोई व्यक्ति किसी पवित्र तीर्थ, मंदिर, मठ, आश्रम या अपने गुरु के स्थान पर जाता है, तो वह केवल सिर झुकाने नहीं जाता। वह अपने दिल की सच्ची श्रद्धा को व्यक्त करने जाता है, और इसी श्रद्धा को जाहिर करने का एक माध्यम है- दान।
डॉ. विनय कुमार वर्मा का कहना है कि हमारे माता-पिता और बुजुर्गों ने हमें बचपन से सिखाया है कि जब भी मंदिर जाओ तो खाली हाथ मत जाओ। भगवान के दरबार में कुछ न कुछ जरूर अर्पित करो। यही सुंदर परंपरा हमारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। हम सब मंदिरों में जाकर पूरी श्रद्धा से सिक्के डालते हैं, बड़े-बड़े नोट चढ़ाते हैं और यथाशक्ति सोना-चाँदी भी अर्पित करते हैं। हमारा यह अटूट विश्वास होता है कि हमारा यह समर्पण सीधे भगवान के चरणों तक पहुँचेगा। यह भावना निस्संदेह बेहद पवित्र है और इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब हमारी इस अंधी श्रद्धा और मंदिर की व्यवस्था के बीच दूरियां बढ़ने लगती हैं।
अरबों का चढ़ावा और पारदर्शिता का बड़ा सवाल
आज हमारे देश के अनेक प्रसिद्ध और भव्य मंदिरों में हर साल करोड़ों-अरबों रुपये का भारी-भरकम चढ़ावा आता है। हालात यह हैं कि कुछ बड़े मंदिरों के पास तो देश के छोटे-मोटे राज्यों के कुल बजट से भी ज्यादा की संपत्ति है। यह सच है कि कई बड़ी और प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाएँ इन पैसों का बहुत अच्छा उपयोग करती हैं। वे बड़े अस्पताल, मुफ्त विद्यालय, गौशालाएँ, अन्नक्षेत्र और समाज कल्याण के कई बड़े काम चलाती हैं। इससे लाखों गरीबों को रोजाना पेटभर भोजन मिलता है, बीमारों का मुफ्त इलाज होता है और कई बेहतरीन सामाजिक योजनाएँ चलती हैं। ऐसे नेक काम ही हमारे धर्म की वास्तविक आत्मा को मजबूत करते हैं।
लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा स्याह पहलू भी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। समय-समय पर तमाम धार्मिक जगहों से दान की राशि में गड़बड़ी, बड़े घोटालों, भ्रष्टाचार और गबन की खबरें भी सुर्खियां बनती हैं। पिछले कुछ सालों में बड़े धार्मिक संस्थानों से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं ने एक आम और सीधे-सादे श्रद्धालु के मन में कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जब एक आम इंसान अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा भगवान के नाम पर श्रद्धा से दान करता है, तो वह हक से जानना चाहता है कि उस पैसे का सही इस्तेमाल कहाँ और कैसे हो रहा है।
क्या दान सिर्फ पैसे चढ़ाना ही है?
यहीं से समाज के भीतर एक बिल्कुल नए और क्रांतिकारी विचार का जन्म होता है। हमें खुद से कुछ कड़वे सवाल पूछने होंगे। क्या दान का मतलब सिर्फ वही पैसा है जो हम चुपचाप किसी बंद दानपेटी में डाल देते हैं? क्या हमारे भगवान सिर्फ मंदिर के गर्भगृह और चौखट के भीतर ही बंद रहते हैं? क्या मंदिर से बाहर बैठे किसी भूखे इंसान को खाना खिलाने से कम पुण्य मिलता है और मंदिर की दानपेटी में बड़े नोट डालने से ज्यादा? इन सवालों पर आज हर सनातनी और जागरूक नागरिक को बहुत ही गंभीरता के साथ विचार करने की सख्त जरूरत है।
हमारे भारतीय अध्यात्म की मूल चेतना हमेशा से यही कहती आई है कि “ईश्वर सर्वत्र है” यानी भगवान कण-कण में मौजूद है। हमारे महान उपनिषद भी यही गवाही देते हैं कि इस पूरी सृष्टि में वही एक परम सत्ता व्याप्त है। संत कबीर साहब ने भी बहुत ही सरल शब्दों में इसे समझाया था कि— "मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।" जब भगवान हर एक जीवित प्राणी के भीतर पहले से ही बैठे हुए हैं, तो फिर किसी लाचार और पीड़ित मनुष्य की सच्ची सहायता करना भी तो सीधे भगवान की ही सेवा हुई। इसी महान और पवित्र भाव को हमारे संतों ने "नर सेवा ही नारायण सेवा" का नाम दिया है।
सोच बदलिए और सीधे भगवान तक दान पहुँचाइए
जरा ठंडे दिमाग से कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति किसी बड़े तीर्थस्थल पर दर्शन करने गया। उसके मन में भगवान के नाम पर पाँच सौ रुपये दान करने का भाव जागा। अगर उस मंदिर में बकायदा रसीद काटने की एक पारदर्शी व्यवस्था है और यह साफ-साफ पता है कि यह पैसा समाज के भले में लगेगा, तब तो वहाँ दान करना बिल्कुल ठीक है। लेकिन, अगर वहाँ की व्यवस्था अस्पष्ट है, पैसों का कोई अता-पता या लेखा-जोखा नहीं है और सिर्फ गुप्त दान देने का ही दबाव है, तब क्या एक सच्चे श्रद्धालु को कुछ पल के लिए ठहरकर विचार नहीं करना चाहिए?
क्यों न वह श्रद्धालु उसी वक्त मन में यह पक्का संकल्प ले कि वह इस पैसे को सीधे किसी जरूरतमंद इंसान तक पहुँचाएगा? जैसे ही वह मंदिर के मुख्य द्वार से बाहर निकलता है, उसे कोई बूढ़ा भूखा व्यक्ति मिल सकता है, कोई लाचार मरीज जो पैसों की कमी से तड़प रहा हो, कोई होनहार गरीब बच्चा जो स्कूल की फीस के लिए रो रहा हो, या फिर किसी बेहद गरीब पिता की जवान बेटी जिसकी शादी पैसों की तंगी की वजह से रुकी हो। अगर वह व्यक्ति उस पैसे से इनकी सीधी मदद कर दे, तो क्या उसका यह सहयोग सीधे भगवान तक नहीं पहुँचेगा? मेरा पूरा विश्वास है कि वह दान भगवान के पास सबसे पहले और बिल्कुल सीधे पहुँचेगा, क्योंकि वहाँ दान सिर्फ पैसों का ट्रांसफर नहीं होगा, बल्कि किसी टूटते हुए जीवन में नई उम्मीद और नई सांसों का संचार होगा।
इंसानियत को समृद्ध बनाना ही असली धर्म है
हमारे सनातन धर्म का मुख्य उद्देश्य केवल ईंट-पत्थरों के मंदिरों को धन-दौलत से समृद्ध बनाना कभी नहीं रहा, बल्कि इसका असली मकसद पूरी मनुष्यता को समृद्ध और सुखी बनाना है। अगर हमारे द्वारा किए गए किसी छोटे से दान की वजह से किसी रोते हुए इंसान के चेहरे पर सच्ची मुस्कान आ जाती है, किसी मरते हुए बीमार का जीवन बच जाता है, किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई की गाड़ी आगे बढ़ जाती है या किसी बेसहारा परिवार का बड़ा संकट हमेशा के लिए टल जाता है, तो यकीन मानिए कि आपका वह दान अपने सबसे ऊँचे और सर्वश्रेष्ठ स्वरूप में स्वीकार होता है।
आज के इस आधुनिक दौर में हमें दान देने की हमारी इस महान परंपरा को खत्म करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, बल्कि इसे और ज्यादा व्यावहारिक और सार्थक बनाने की जरूरत है। इसके साथ ही, हमारे बड़े मंदिरों और कमेटियों को भी आगे आना होगा और अपने सारे आय-व्यय के रिकॉर्ड को पूरी तरह से पारदर्शी और ऑनलाइन बनाना होगा। उन्हें खुले तौर पर समाज को बताना चाहिए कि श्रद्धालुओं से मिला दान कहाँ खर्च हुआ, उससे कितने गरीबों को लाभ मिला और कौन-कौन सी लोक-कल्याणकारी योजनाएँ धरातल पर चल रही हैं। जब एक आम भक्त को यह पूरा भरोसा मिल जाएगा कि उसका चढ़ाया एक-एक पैसा वास्तव में समाज के भले में लग रहा है, तो भगवान के प्रति उसकी आस्था और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगी।
हर परिवार ले एक छोटा सा सामाजिक जिम्मा
इसके साथ ही, हम सभी आम श्रद्धालुओं को भी अपने जीवन में एक नया नियम बनाना होगा। जैसे हम अपनी कुल कमाई का एक निश्चित हिस्सा धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ के लिए अलग निकालते हैं, ठीक वैसे ही उसका कुछ प्रतिशत हिस्सा हमें सीधे मानव सेवा के लिए भी सुरक्षित रखना चाहिए। यह सेवा आप चाहे तो किसी अच्छी और ईमानदार संस्था के माध्यम से कर सकते हैं या फिर अपने निजी स्तर पर सीधे तौर पर भी कर सकते हैं।
अगर हमारे देश का प्रत्येक सक्षम परिवार साल में सिर्फ एक गरीब और होनहार छात्र की पूरी पढ़ाई का जिम्मा उठा ले, सिर्फ एक बेसहारा मरीज के इलाज में छोटी सी सहायता कर दे, या फिर किसी एक भूखे परिवार के राशन की जिम्मेदारी ले ले, तो हमारे समाज की आधी से ज्यादा बड़ी समस्याएँ अपने आप ही हल होने लगेंगी। इस बड़े बदलाव के लिए हमें किसी सरकारी योजना या नेता के भरोसे बैठने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह कमाल तो आम इंसान के दिलों में छिपी करुणा और दया की भावना से ही चुटकियों में संभव हो जाएगा।
करुणा और सेवा ही धर्म का सुंदर संतुलन है
हमें हमेशा यह बात याद रखनी होगी कि हमारे धर्म का भविष्य सिर्फ बड़े-बड़े भव्य मंदिरों के निर्माण से सुरक्षित नहीं रहेगा, बल्कि इसका भविष्य संवेदनशील और दयालु इंसानों के जिंदा रहने से सुरक्षित होगा। यहाँ यह भी समझना बेहद जरूरी है कि मंदिरों की महत्ता कभी कम नहीं हो सकती। मंदिर हमारे समाज की सकारात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा के सबसे बड़े केंद्र हैं। वे हमारी महान सांस्कृतिक पहचान हैं और भागदौड़ भरी जिंदगी में हमें असीम आत्मिक शांति प्रदान करते हैं। लेकिन किसी भी मंदिर की असली गरिमा और भव्यता तभी है, जब उसके ऊँचे द्वारों से करुणा, निस्वार्थ सेवा और लोकमंगल की पवित्र गंगा लगातार बहती रहे।
कितना सुंदर नजारा होगा जब एक तरफ मंदिर के गर्भगृह में आस्था का घी का दीपक जले और ठीक उसी समय दूसरी तरफ बाहर किसी गरीब और लाचार के घर की रसोई का चूल्हा भी जल उठे- यही अद्भुत संतुलन तो हमारे धर्म की सबसे बड़ी खूबसूरती और ताकत है। आज का यह समय हमसे एक बिल्कुल नई और व्यापक दृष्टि की मांग कर रहा है। हमारी श्रद्धा वैसी ही बनी रहे, हमारी आस्था अटूट रहे, रोज नियम से पूजा-पाठ भी हो और हमारे तीर्थ स्थान भी सजते रहें; लेकिन इन सब के बीच हमारे दान का दायरा थोड़ा बड़ा और व्यापक हो जाए। हमारा दान सिर्फ मंदिर की लोहे की दानपेटी तक ही सीमित न रहे, बल्कि वह तड़पती हुई मानवता के काम आए।
पत्थर की मूर्ति से जीवित मनुष्य तक का सफर
शायद आने वाले समय का सबसे बड़ा और सबसे क्रांतिकारी धार्मिक सुधार यही कहलाएगा, जब हम मंदिर के भीतर जाकर पूरी श्रद्धा से भगवान के दिव्य दर्शन करेंगे और मंदिर के मुख्य द्वार से बाहर निकलते ही साक्षात भगवान के जीवित स्वरूप- यानी लाचार मनुष्यों की सेवा में जुट जाएंगे।
क्योंकि हम सब जानते हैं कि उस परमपिता परमेश्वर को हमारे कागज के नोटों की कोई जरूरत नहीं है। उन्हें तो सिर्फ हमारा करुणामय और साफ दिल चाहिए। जब हमारा दान मंदिर की तंग दानपेटी की दीवारों से बाहर निकलकर तड़पती हुई मानवता के आंसू पोंछने पहुँचता है, तभी हमारा धर्म अपने सबसे सच्चे और सबसे सुंदर रूप में इस धरती पर प्रकट होता है।
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