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नौतपा विशेष: सूर्य की प्रखर तपन से मनुष्य के धैर्य तक, समझें 25 मई से शुरू होने वाले इन 9 दिनों का दर्शन

भारतीय संस्कृति और खगोल विज्ञान का अद्भुत संगम है 'नौतपा'। रोहिणी नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश के साथ शुरू होने वाले इन नौ दिनों की भीषण तपन कैसे मनुष्य को सहनशीलता और प्रकृति से जुड़ने का पाठ पढ़ाती है, जानिए इस विशेष रिपोर्ट में।

 
 

रोहिणी नक्षत्र में सूर्य का प्रवेश

25 मई से 2 जून तक नौतपा

भीषण गर्मी और लू का चरम काल

प्रकृति और मनुष्य के धैर्य की परीक्षा

मौसम विज्ञान और ज्योतिष का संगम

भारतीय जनमानस में 'नौतपा' केवल नौ दिनों की भीषण गर्मी का नाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, ज्योतिष, कृषि और अध्यात्म का एक अनूठा संगम है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तब शुरुआती नौ दिनों को विशेष तपन वाला माना जाता है। सामान्यतः यह कालखंड प्रतिवर्ष 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक चलता है। मौसम विज्ञान की दृष्टि से भी भारत में लू और अत्यधिक गर्मी का चरम समय यही होता है, जब धरती और आकाश के बीच ताप का तीखा संवाद स्थापित होता है।

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सहनशीलता सिखाता जीवन-दर्शन
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं— "तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।" अर्थात मैं ही सूर्यरूप होकर संसार को तपाता हूँ और मैं ही वर्षा को रोकता व बरसाता हूँ। हमारे ऋषियों ने इस ऋतु चक्र को एक जीवंत ग्रंथ की तरह पढ़ा है। जब हवाओं में आग की लपटें होती हैं और कुओं का जलस्तर नीचे चला जाता है, तब नौतपा मनुष्य को याद दिलाता है कि जीवन सिर्फ सुख-सुविधाओं से नहीं, बल्कि सहनशीलता और विपरीत परिस्थितियों को सहने के आत्मिक तप से चलता है।
            
भारतीय ऋषियों ने प्रकृति को कभी केवल दृश्य नहीं माना; उन्होंने उसे एक जीवंत ग्रंथ की तरह पढ़ा। आकाश उनका शास्त्र था, ऋतुएँ उसके अध्याय थीं और सूर्य उसका सबसे प्रखर अक्षर। नौतपा उसी शाश्वत ग्रंथ का एक ऐसा अध्याय है जिसे भारतीय जनमानस हजारों वर्षों से पढ़ता, समझता और जीता आया है।
          
नौतपा केवल नौ दिनों की गर्मी का नाम नहीं है; यह भारतीय जीवन-दर्शन में प्रकृति, ज्योतिष, खगोल, कृषि, समाज और अध्यात्म के एक अद्भुत संगम का नाम है। यह वह समय है जब आकाश में सूर्य अपनी तपन को जैसे पृथ्वी के माथे पर रख देता है, हवा अपने भीतर आग की महीन किरचें लिए चलती है, कुओं का जल नीचे उतरता है, पेड़ों की छाया छोटी पड़ जाती है और मनुष्य को पहली बार याद आता है कि जीवन केवल सुविधा से नहीं, सहनशीलता से भी चलता है।

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लोक में इसे “नौतपा” कहा गया- नौ दिन का तप। ज्योतिषीय परंपरा के अनुसार जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब प्रारंभ के नौ दिन विशेष तपन वाले माने जाते हैं। इसी कारण इसे नौतपा कहा गया। सामान्यतः यह काल मई के अंतिम सप्ताह से जून के आरंभ तक आता है अक्सर 25 मई से 2 जून तकl भारत में लू और अत्यधिक गर्मी का चरम समय प्रायः इसी अवधि में देखा जाता है। मौसम विज्ञान की दृष्टि से यह वह समय है जब धरती और आकाश के बीच ताप का संवाद अपने सबसे तीखे रूप में उपस्थित होता है।
     
ज्योतिष में रोहिणी नक्षत्र को अत्यंत संवेदनशील, सृजनशील और धरती से जुड़ा नक्षत्र माना गया है। रोहिणी का संबंध वृद्धि, अन्न, सौंदर्य, उर्वरता और जीवन- पोषण से जोड़ा जाता है। जब सूर्य इस नक्षत्र से गुजरता है, तब लोकमानस ने अनुभव किया कि पृथ्वी का ताप बढ़ता है, खेत सूखते हैं, जलस्रोत सिकुड़ते हैं और आकाश मानसून के स्वागत की तैयारी करने लगता है। इसलिए नौतपा को केवल कष्ट नहीं माना गया, बल्कि आने वाली वर्षा की भूमिका भी समझा गया।

 भारतीय कृषि-परंपरा में एक प्रसिद्ध कहावत है- 
"रोहिणी तपे, मृग न तपे तो कुछ-कुछ हो'
दोनों यदि तप जाएँ तो अन्न का भंडार होय।"
            
यह केवल लोकविश्वास नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव का सार है। किसान आधुनिक मौसम विभाग से बहुत पहले आकाश को पढ़ना जानता था। वह नक्षत्रों की चाल, हवाओं की दिशा, बादलों के रंग और सूर्य की तपन से आने वाले मौसम का अनुमान लगाने का प्रयास करता था। इसी अनुभव ने नौतपा को कृषि-संस्कृति का एक महत्वपूर्ण संकेतक बना दिया।
     
 ग्रामीण भारत में एक और विश्वास रहा है- 
"नौतपा तपे, तो बरखा छपे।"
             अर्थात् यदि नौतपा अपनी पूरी तीव्रता से तपे, तो वर्षा भी अच्छी होने की संभावना रहती है। आधुनिक मौसम विज्ञान इस संबंध को प्रत्यक्ष और पूर्ण नियम नहीं मानता, किंतु इसके भीतर एक लोक-वैज्ञानिक अनुभव अवश्य छिपा है। तीव्र गर्मी भूमि और वायुमंडल के बीच ताप-अंतर को बढ़ाती है। यही ताप-अंतर आगे चलकर मानसूनी हवाओं की गति और दबाव-प्रणालियों से जुड़ता है। वर्षा केवल नौतपा से तय नहीं होती; समुद्री तापमान, वायुदाब, हवा की दिशा, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की स्थितियाँ- सभी कारक कार्य करते हैं। फिर भी लोक ने अपने लंबे अनुभव से यह देखा कि कठोर गर्मी के बाद वर्षा की प्रतीक्षा अधिक गहरी हो जाती है।

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लोकमान्यता में नौतपा को लेकर एक और कहावत प्रसिद्ध है- 
"दो मूसा, दो कातरा, दो टिड्डी, दो ताप।
दो की बाजी जल हरे, दो बिस्वर, दो साँप॥"

 इसका आशय यह है कि नौतपा के दिनों की प्रखर गर्मी चूहों, कीटों, टिड्डियों, रोगकारक जीवाणुओं और अनेक हानिकारक जीवों की संख्या को नियंत्रित करती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह बात पूर्णतः सिद्ध नियम नहीं है, किंतु इतना अवश्य सत्य है कि अत्यधिक तापमान कई कीटों, अंडों और रोगजनक जीवों के जीवन-चक्र को प्रभावित करता है। भारतीय किसान ने इसी अनुभव को लोककथा और कहावत के रूप में सुरक्षित रखा।

खगोलीय दृष्टि से देखें तो नौतपा कोई चमत्कारिक या रहस्यमयी घटना नहीं है, बल्कि सूर्य की वार्षिक गति और पृथ्वी पर ऋतु-परिवर्तन की स्वाभाविक प्रक्रिया का लोकनाम है। मई-जून में उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर अधिक झुका होता है। भारत में इस समय सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत अधिक सीधी पड़ती हैं, दिन बड़े होते हैं और धरती लंबे समय तक ऊष्मा ग्रहण करती है। इसलिए तापमान बढ़ता है। विज्ञान इसकी व्याख्या करता है, जबकि लोकजीवन इसे अनुभव करता है। दोनों की भाषाएँ अलग हैं, पर संकेत एक ही है।
         
मौसम विभाग की दृष्टि से नौतपा को सावधानी का काल माना जाना चाहिए। यह वह समय है जब मनुष्य की देह पर गर्मी का दबाव बढ़ता है। तेज धूप, गरम हवा, निर्जलीकरण, थकान, चक्कर, तेज बुखार, उलझन और लू लगने जैसे खतरे बढ़ जाते हैं। दिन की गर्मी के बाद यदि रातें भी गर्म रहें, तो शरीर को पर्याप्त विश्राम नहीं मिल पाता। इसलिए इस समय पानी का सेवन, छाया में विश्राम, हल्का भोजन और सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
   
 लेकिन भारतीय समाज ने नौतपा को केवल भय का समय नहीं बनाया। उसने इसे अनुशासन का समय बनाया। दोपहर में बाहर कम निकलना, सिर ढककर चलना, प्याज, सत्तू, छाछ, बेल, आम-पन्ना, नींबू-पानी, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज, जौ और चने जैसी चीजों का उपयोग- ये सब केवल घरेलू आदतें नहीं थीं, बल्कि सामुदायिक स्वास्थ्य-नीति थीं। गाँवों में पेड़ के नीचे बैठना, पशुओं को अतिरिक्त पानी देना, राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, मिट्टी के घड़े रखना- ये सब नौतपा की सामाजिक संस्कृति रहे हैं।

यही कारण है कि नौतपा भारतीय संवेदना का भी पर्व है। जब किसी अजनबी राहगीर को पानी पिलाना पुण्य समझा जाए, जब घर की छत पर पक्षियों के लिए जल रखा जाए, जब पशुओं के लिए हौद भरे जाएँ- तब समाज केवल जीवित नहीं रहता, बल्कि मानवीय भी बना रहता है।
     
कबीरदास की पंक्तियाँ ऐसे ही समय में याद आती हैं-
"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥"
       
 नौतपा की सच्ची साधना शायद यही है कि हमारे पास इतना जल अवश्य हो कि हम अपनी प्यास भी बुझाएँ और किसी दूसरे की भी। पौराणिक दृष्टि से सूर्य केवल अग्नि-पिंड नहीं हैं; वे जीवन के साक्षी हैं। वेदों में सूर्य को प्रकाश, चेतना, स्वास्थ्य और ऋतु-नियंता के रूप में देखा गया। ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं- 
"सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।"
          अर्थात् सूर्य सम्पूर्ण चर और अचर जगत की आत्मा हैं। 

भारतीय चिंतन में सूर्य तपाते भी हैं और पकाते भी हैं। वे जल को वाष्प बनाते हैं, बादल बनाते हैं, अन्न पकाते हैं और रोगाणुओं को नष्ट करने वाली ऊर्जा भी देते हैं। इसलिए सूर्य का ताप दंड नहीं, जीवन-चक्र का अनिवार्य हिस्सा है।

महाकवि कालिदास ने ऋतुसंहार में ग्रीष्म का वर्णन करते हुए मानो इसी नौतपा की अनुभूति को शब्द दिए हैं। तपती धरती, सूखती नदियाँ और वर्षा की प्रतीक्षा- इन सबके बीच प्रकृति किसी बड़ी तैयारी में लगी दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे समूची सृष्टि सावन के स्वागत हेतु स्वयं को तपाकर तैयार कर रही हो।

        
नौतपा हमें यह भी सिखाता है कि प्रकृति में हर सुख से पहले तप है। वर्षा से पहले गर्मी है। अंकुर से पहले बीज का फटना है। शीतलता से पहले दाह है। मनुष्य भी जब भीतर से तपता है, तभी परिपक्व होता है।
उपनिषदों का संदेश है- 
"तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व।"
                अर्थात तप के माध्यम से सत्य की खोज करो।

भारतीय अध्यात्म में तप का अर्थ केवल कष्ट सहना नहीं, बल्कि भीतर की अशुद्धियों को जलाकर स्पष्टता प्राप्त करना है। नौतपा बाहर का ताप है, पर उसका संकेत भीतर के तप की ओर भी है। यह हमें बताता है कि जीवन की बड़ी उपलब्धियाँ सहज नहीं मिलतीं; वे धैर्य, संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद प्राप्त होती हैं।

       पूर्वांचल के लोकगीतों में यह प्रतीक्षा बड़े मार्मिक रूप में व्यक्त होती है-
"जेठवा के घाम बड़ा जियरा जरावे,
बदरिया कब आईं, मनवा पूछे जावे।"
        
यह केवल मौसम का गीत नहीं, आशा का गीत है। मनुष्य का समूचा जीवन भी कहीं न कहीं इसी प्रतीक्षा का नाम है- तपन के बाद शीतलता की प्रतीक्षा, अंधकार के बाद प्रकाश की प्रतीक्षा, संघर्ष के बाद सफलता की प्रतीक्षा।

यह समय हमें जल का महत्व भी सिखाता है। जब घड़े का पानी अमृत लगने लगे, जब पेड़ की छाया मंदिर जैसी लगे, जब पशु-पक्षियों के लिए कटोरे में रखा जल पुण्य जैसा लगे- तब समझना चाहिए कि नौतपा केवल तापमान नहीं, करुणा की परीक्षा भी है।

आज शहरों में नौतपा का अर्थ बदल गया है। पहले लोग गर्मी को प्रकृति की भाषा मानते थे; अब उसे एसी, कंक्रीट और बिजली की बढ़ती मांग के बीच महसूस करते हैं। गर्मी बढ़ती है तो बिजली की खपत बढ़ती है, जल संकट बढ़ता है, श्रमिकों की कठिनाई बढ़ती है और पर्यावरणीय असंतुलन स्पष्ट दिखाई देने लगता है। नौतपा अब केवल पंचांग का विषय नहीं रहा; यह जल, ऊर्जा, स्वास्थ्य और जलवायु-नीति का प्रश्न भी बन चुका है।

सामाजिक दृष्टि से नौतपा हमें असमानता का आईना दिखाता है। जिसके घर में शीतल कमरा है, उसके लिए गर्मी असुविधा है; पर रिक्शा चलाने वाले, खेत में काम करने वाले, निर्माण-स्थल के मजदूर, पुलिसकर्मी, सब्जी बेचने वाले और खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने वालों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है। इसलिए नौतपा का सबसे बड़ा धर्म है-दया। इस समय हर मोहल्ले में जल-व्यवस्था, छाया-स्थल, श्रमिकों के लिए विश्राम, पशु-पक्षियों के लिए पानी और बुजुर्गों-बच्चों की देखभाल सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
राजस्थान की एक पुरानी कहावत है-
"जेठ रो घाम, सावण रो धाम।"
          अर्थात् जेठ की धूप ही सावन की हरियाली का मार्ग बनाती है।

नौतपा का आध्यात्मिक संदेश बहुत गहरा है। सूर्य कहता है- जो जलना जानता है, वही प्रकाश दे सकता है। पृथ्वी कहती है- जो सहना जानता है, वही अन्न दे सकता है। बादल कहते हैं- जो वाष्प बनकर उठता है, वही वर्षा बनकर लौटता है। मनुष्य के जीवन में भी संकट, तपन और प्रतीक्षा ऐसे ही हैं। हर कठिन समय, यदि विवेक से जिया जाए, तो भीतर वर्षा बनकर लौटता है।

       
आज आवश्यकता है कि हम नौतपा को अंधविश्वास और अति-वैज्ञानिक अहंकार- दोनों से बचाकर समझें। न तो इसे केवल चमत्कार मानें, न केवल मौसम का आँकड़ा। यह भारतीय लोक-बुद्धि का जीवित अनुभव है। इसमें पंचांग भी है, पर्यावरण भी; सूर्य भी है, जल भी; खेत भी है, शरीर भी; तप भी है, करुणा भी।

नौतपा हमें याद दिलाता है कि प्रकृति से बड़ा कोई कैलेंडर नहीं, सूर्य से बड़ा कोई शिक्षक नहीं और जल से बड़ा कोई प्रसाद नहीं। ये नौ दिन मनुष्य से पूछते हैं- क्या तुम केवल ठंडक चाहते हो, या तप से जन्मी परिपक्वता भी? क्या तुम केवल वर्षा की प्रतीक्षा करते हो, या जल बचाने की जिम्मेदारी भी निभाते हो? क्या तुम केवल अपना शरीर बचाते हो, या किसी प्यासे पशु-पक्षी, श्रमिक, राहगीर और गरीब मनुष्य के लिए भी एक घड़ा भरते हो?
      
नौतपा सूर्य का ताप नहीं, जीवन का पाठ है। यह हमें बताता है कि तपे बिना धरती नहीं महकती, सहन किए बिना मनुष्य नहीं निखरता और करुणा के बिना कोई समाज सभ्य नहीं कहलाता। नौतपा के नौ दिन यदि हमें जल, छाया, संयम, सेवा और प्रकृति-सम्मान की शिक्षा दे जाएँ, तो यह केवल गर्मी का मौसम नहीं रहेगा- यह मनुष्यत्व का उत्सव बन जाएगा। धधकती दोपहरों के भीतर ही वर्षा की पहली बूँद जन्म लेती है, और शायद मनुष्य के भीतर भी कोई नया सावन आकार ले रहा होता है।

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