पश्चिम एशिया में युद्ध और तेल संकट के बीच PM मोदी की विदेश यात्राएं: 'मेलोडी' मोमेंट्स के पीछे छिपा है भारत का बड़ा मास्टरप्लान
पश्चिम एशिया के युद्ध और गहराते तेल संकट के बीच पीएम मोदी की विदेश यात्राएं और 'मेलोडी' मोमेंट्स सुर्खियां बटोर रहे हैं। आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. विनय प्रकाश तिवारी से जानिए कैसे यह तस्वीरें भारत की एक बेहद सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं।
पश्चिम एशिया संकट और भारतीय डिप्लोमेसी
ईरान इज़राइल तनाव और तेल संकट
पीएम मोदी का वैश्विक कूटनीतिक दौरा
मेलोडी मोमेंट्स और रणनीतिक साझेदारी
डॉ. विनय प्रकाश तिवारी का विश्लेषण
वर्तमान समय में पूरा पश्चिम एशिया तनाव और युद्ध की भीषण आग में घिरा हुआ है। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते प्रत्यक्ष संघर्ष ने न केवल मध्य-पूर्व बल्कि पूरी दुनिया को गहरी चिंता में डाल दिया है। इस वैश्विक संकट का सबसे पहला और सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर देखने को मिल रहा है, जिससे कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता काफी बढ़ गई है।
भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल की आवश्यकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी आयातों के जरिए ही पूरा करता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में जब देश के भीतर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को लेकर आम जनता में आशंकाएं बढ़ रही हों, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएं और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले हल्के-फुल्के “मेलोडी” (Melody) मोमेंट्स कई सवाल खड़े करते हैं। आखिर इस गंभीर माहौल में भारत की यह कूटनीति क्या संकेत दे रही है? आइए इसे आर्थिक मामलों के जाने-माने जानकार डॉ. विनय प्रकाश तिवारी के नजरिए से विस्तार से समझते हैं।

जटिल भू-राजनीति और भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति
डॉ. विनय प्रकाश तिवारी के अनुसार, भारत इस समय दुनिया की सबसे जटिल भू-राजनीतिक (geopolitical) परिस्थितियों के चौराहे पर खड़ा है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संकट के इस दौर में संतुलन कैसे बनाया जाए। एक तरफ इज़राइल भारत का बेहद मजबूत रणनीतिक और रक्षा सहयोगी है, जिससे देश के सुरक्षा हित जुड़े हैं। दूसरी तरफ, ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी (जैसे चाबहार पोर्ट) की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके साथ ही, भारत को सुपरपावर अमेरिका के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाए रखना है, जबकि अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद मित्र रूस के साथ भी ऐतिहासिक रिश्तों में कोई खटास नहीं आने देनी है।
यही कारण है कि आज भारत की विदेश नीति किसी एक गुट या ब्लॉक की राजनीति तक सीमित नहीं रह गई है। भारत अब "मल्टी-अलाइनमेंट" (multi-alignment) की नीति पर चल रहा है, जिसका सीधा अर्थ है कि भारत हर वैश्विक शक्ति के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र और संतुलित संबंध विकसित कर रहा है।
कैमरे की मुस्कान के पीछे छिपे आर्थिक हित
जब भी पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी परिस्थितियां बनती हैं, तो उसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ता है। यदि ईरान और इज़राइल के बीच का यह टकराव लंबा खिंचता है, तो आने वाले समय में घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में भारी उछाल आना तय है। ईंधन के दाम बढ़ने का असर केवल वाहन मालिकों की जेब तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह ट्रांसपोर्टेशन, कृषि लागत, विनिर्माण उद्योग और अंततः आम जनता की रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं को महंगा कर देता है। इस तरह देश में मुद्रास्फीति या महंगाई बढ़ने का खतरा तेजी से मंडराने लगता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को महज एक औपचारिक दौरे या फोटोशूट के रूप में देखना पूरी तस्वीर को न समझने जैसा होगा।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं के चेहरों पर दिखने वाली मुस्कान और व्यक्तिगत केमिस्ट्री के पीछे गहरे आर्थिक समझौते और कूटनीतिक रणनीतियां काम कर रही होती हैं। भारत इस समय यूरोप और मध्य-पूर्व के देशों के साथ ऊर्जा सहयोग सुरक्षित करने, विदेशी निवेश आकर्षित करने, रक्षा साझेदारियों को मजबूत करने और व्यापार के नए वैकल्पिक मार्गों (जैसे आईएमईसी कॉरिडोर) को बहाल करने पर तेजी से काम कर रहा है। इटली जैसी यूरोपीय शक्तियों के साथ बेहतर संबंध इसी कूटनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
जनता की वास्तविक चिंताएं और सरकार के सामने चुनौतियां
हालांकि, इस कूटनीति का एक दूसरा पहलू भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और जिस पर जनता का सवाल उठाना पूरी तरह से वाजिब है। जब देश का आम नागरिक पेट्रोल-डीज़ल की लगातार बढ़ती कीमतों और उससे पैदा होने वाली महंगाई से जूझ रहा हो, जब डीजल महंगा होने के कारण किसानों की खेती और ट्रांसपोर्ट व्यवसायियों की लागत बढ़ रही हो, तब सोशल मीडिया पर राजनेताओं के हल्के-फुल्के पल और विदेशी दौरों की शानदार तस्वीरें आम जनता को उनकी जमीनी हकीकत और वास्तविक समस्याओं से कटा हुआ (disconnected) महसूस करा सकती हैं। यही वजह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर लगातार तीखी बहस छिड़ी हुई है कि क्या सरकार इस गंभीर आर्थिक संकट को उतनी प्राथमिकता दे रही है, जितनी दी जानी चाहिए।
आधुनिक भारतीय कूटनीति की असली परीक्षा
देखा जाए तो भारत इस समय अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक बेहद कठिन संतुलन साधने की कोशिश (balancing act) कर रहा है। भारत को खुद को इस युद्ध की विभीषिका से दूर भी रखना है, दुनिया के हर शक्तिशाली देश के साथ अपने द्विपक्षीय संबंध भी बचाए रखने हैं, देश के लिए तेल की निर्बाध सप्लाई भी सुनिश्चित करनी है और साथ ही अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता प्रदान करनी है। यही आधुनिक भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा बन चुकी है। डॉ. विनय प्रकाश तिवारी का मानना है कि यह पूरा वैश्विक संकट भारत के लिए एक बहुत बड़ा सबक और दूरगामी संकेत भी है।
भविष्य में केवल कूटनीतिक बातचीत या मधुर संबंध ही काफी नहीं होंगे। भारत को अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा), इथेनॉल ब्लेंडिंग, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (strategic oil reserves) और घरेलू स्तर पर तेल व गैस के उत्पादन को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। क्योंकि जो देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयातित तेल पर निर्भर रहता है, वह वैश्विक युद्धों के समय सबसे अधिक आर्थिक दबाव का सामना करता है। भारत आज दुनिया को यह संदेश तो दे रहा है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय संतुलन की राह पर चलेगा, लेकिन आने वाले समय में असली परीक्षा यही होगी कि यह कूटनीति केवल सुर्खियों और कैमरों तक सीमित रहती है या देश को बड़े आर्थिक और ऊर्जा संकट से सुरक्षित बाहर निकालने में सफल होती है।
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