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पुलिस का काम डराना नहीं, सुरक्षा का अहसास कराना है; कानून की वर्दी और जनता के बीच भरोसा बढ़ाने की जरुरत

पुलिस व्यवस्था किसी भी सभ्य समाज की रीढ़ होती है। लेकिन जब सुरक्षा देने वाली वर्दी ही भय और मनमानी का प्रतीक बन जाए, तो जनता का भरोसा टूटने लगता है। पुलिस और नागरिकों के बदलते रिश्तों पर पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट...

 
 

न्याय की भाषा बोले कानून की वर्दी

सभ्य समाज की रीढ़ है पुलिस

अपराधियों में डर, जनता में हो भरोसा

पुलिस को देखकर सावधान न होना पड़े

नागरिक सुरक्षा का मजबूत आश्वासन जरूरी

कानून की वर्दी जब न्याय की भाषा बोलती है, तब समाज निश्चिंत होकर सोता है; लेकिन वही वर्दी यदि भय, अपमान और मनमानी का प्रतीक बनने लगे, तो नागरिक के मन में राज्य के प्रति विश्वास की जगह संदेह जन्म लेने लगता है। पुलिस व्यवस्था किसी सभ्य समाज की रीढ़ होती है। वह केवल अपराधियों को पकड़ने वाली संस्था नहीं, बल्कि नागरिक जीवन की सुरक्षा का आश्वासन होती है। सड़क पर चलती स्त्री, दुकान बंद कर लौटता व्यापारी, परीक्षा देकर घर जाता छात्र, खेत से लौटता किसान और रात में दवा लेने निकला पिता-इन सबके मन में यह भरोसा होना चाहिए कि पुलिस है, इसलिए हम सुरक्षित हैं; न कि पुलिस है, इसलिए हमें सावधान रहना है।
              
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इसी भरोसे को पुनर्जीवित करने वाली एक गंभीर न्यायिक घंटी की तरह है। न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी निर्दोष नागरिक को बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के हिरासत में रखना कोई छोटी प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि उसके मौलिक अधिकारों पर चोट है। यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से रोका गया, बैठाया गया, जेल भेजा गया या 24 घंटे से अधिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना रखा गया, तो यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं है; यह संविधान की आत्मा पर खरोंच है। ₹25,000 प्रतिदिन की क्षतिपूर्ति का विचार केवल आर्थिक दंड नहीं, बल्कि यह घोषणा है कि नागरिक की स्वतंत्रता की कीमत होती है, उसकी गरिमा की कीमत होती है, उसका समय भी मूल्यवान है और उसका सम्मान भी।
              
पुलिस समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए है। असामाजिक तत्वों, अपराधियों, हिंसक प्रवृत्तियों और कानून तोड़ने वालों के प्रति पुलिस का कठोर होना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। अपराधी यदि कानून से नहीं डरेंगे तो समाज कमजोर होगा। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब अपराधी और सामान्य नागरिक के बीच की रेखा धुँधली कर दी जाती है। जब थाने में शिकायत लेकर आया आदमी ही संदिग्ध बना दिया जाता है, जब सड़क पर वाहन जाँच के दौरान नागरिक की चाबी निकाल लेना अधिकार समझ लिया जाता है, जब मोबाइल से वीडियो बनाने वाले को डाँटकर चुप करा देना पुलिसिया प्रतिष्ठा मान ली जाती है, जब किसी सम्मानित नागरिक को सबके सामने गाली देकर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा उतार दी जाती है, तब कानून की शक्ति सेवा से हटकर भय का औजार बन जाती है।

आम आदमी पुलिस से दुश्मनी नहीं चाहता। वह पुलिस से मित्रता भी नहीं चाहता। वह केवल निष्पक्ष व्यवहार चाहता है। वह चाहता है कि यदि वह गलत नहीं है, तो उसे डरना न पड़े। लेकिन दुर्भाग्य से वर्षों में एक ऐसी मानसिकता बनती गई है कि लोग पुलिस से दूर रहना ही सुरक्षित समझते हैं। सड़क पर दुर्घटना हो जाए तो कई लोग घायल को उठाने से पहले सोचते हैं कि कहीं बाद में पुलिस की पूछताछ में न फँस जाएँ। किसी गली में अपराध होता देख लोग सूचना देने से कतराते हैं कि कहीं उन्हें ही थाने के चक्कर न लगाने पड़ जाएँ। किसी के घर के सामने घटना हो जाए तो वह घरवाला भयभीत हो जाता है कि पुलिस सबसे पहले उसी से सवाल करेगी। यह स्थिति किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
           
थाने का दरवाज़ा नागरिक के लिए न्याय का पहला द्वार होना चाहिए, लेकिन बहुत बार वह भय का पहला पड़ाव बन जाता है। कोई आवेदन लेकर पहुँचे तो उसकी बात ध्यान से सुनने के बजाय उसे टाल देना, उल्टा डाँटना, कमजोर पक्ष को और दबाना, प्रभावशाली व्यक्ति की भाषा में बोलना- ये सब वे छोटी-छोटी घटनाएँ हैं जो मिलकर पुलिस और जनता के बीच गहरी खाई बना देती हैं। न्यायालय का निर्णय इसी खाई को भरने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पुलिस को कमजोर करने वाला फैसला नहीं है, बल्कि पुलिस को अधिक विधिसम्मत, अधिक उत्तरदायी और अधिक सम्मानजनक बनाने वाला फैसला है।
          
कानून का शासन तभी संभव है जब कानून लागू करने वाला स्वयं कानून के भीतर रहे। यदि पुलिस स्वयं प्रक्रिया को बोझ मानने लगे, यदि गिरफ्तारी को आसान हथियार बना ले, यदि हिरासत को दबाव बनाने का माध्यम बना ले, तो फिर सामान्य नागरिक किसके पास जाएगा? संविधान ने नागरिक को स्वतंत्रता दी है। यह स्वतंत्रता सरकार की दया नहीं, नागरिक का अधिकार है। किसी व्यक्ति को पकड़ लेना, घंटों बैठाए रखना, रात भर रोक लेना, बिना स्पष्ट कारण के थाने में रख लेना- ये सब बातें भले ही व्यवहार में 
सामान्य समझी जाती रही हों, लेकिन कानून की दृष्टि में सामान्य नहीं हैं। न्यायालय ने इसी सामान्यीकृत अन्याय को असामान्य घोषित किया है।
समय बदल रहा है। आज सोशल मीडिया एक बड़ा दर्पण बनकर सामने आया है। पहले जो बातें थाने की चारदीवारी में दब जाती थीं, आज वे मिनटों में समाज के सामने आ जाती हैं। पहले डंडा और डाँट व्यवस्था का अनकहा हथियार माने जाते थे, आज कैमरा और नागरिक चेतना उनके सामने खड़े हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर वीडियो में पुलिस गलत होती है, न ही यह कि भीड़ का निर्णय अदालत का निर्णय बन जाए। लेकिन यह अवश्य सत्य है कि अब जवाबदेही से बचना कठिन होता जा रहा है। आज पुलिस की हर कार्रवाई केवल मौके पर मौजूद लोगों द्वारा नहीं, बल्कि समाज, मीडिया और न्यायालय द्वारा भी देखी जा सकती है।
           
 न्यायपालिका की यह बढ़ती सजगता अचानक उत्पन्न नहीं हुई है। इसके पीछे वे दर्दनाक घटनाएँ भी हैं जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। तमिलनाडु के सत्तानकुलम में वर्ष 2020 में पिता पी. जयराज और पुत्र जे. बेनिक्स की पुलिस हिरासत में हुई मृत्यु ऐसी ही एक घटना थी। वह केवल दो व्यक्तियों की मृत्यु नहीं थी, बल्कि उस विश्वास पर भी गहरी चोट थी जिसके सहारे नागरिक कानून की शरण में जाता है। पूरे देश ने उस घटना को देखा, सुना और महसूस किया। वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड का निर्णय इस बात का प्रमाण बना कि लोकतंत्र में वर्दी कानून से ऊपर नहीं है।
सत्तानकुलम की वह त्रासदी और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय, दोनों मिलकर एक ही संदेश देते हैं- राज्य की शक्ति का उद्देश्य नागरिक को भयभीत करना नहीं, उसकी स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है। कानून की रक्षा करने वाली संस्था यदि कभी अपनी मर्यादा से भटक जाए, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप केवल अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवश्यकता बन जाता है। यही कारण है कि आज नागरिक अधिकारों और पुलिस जवाबदेही पर पहले से अधिक गंभीरता से चर्चा हो रही है।
           
फिर भी हमें एक संतुलित दृष्टि रखनी होगी। पुलिसकर्मी भी मनुष्य हैं। वे कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। लंबी ड्यूटी, राजनीतिक दबाव, संसाधनों की कमी, अपराधियों का दुस्साहस, जनता की अपेक्षाएँ और ऊपर से परिणाम देने का दबाव-इन सबके बीच पुलिस का काम सरल नहीं है। किसी त्यौहार में जब हम अपने परिवार के साथ होते हैं, पुलिस सड़क पर खड़ी होती है। किसी दंगे की आशंका में जब लोग घरों में छिप जाते हैं, पुलिस मोर्चे पर होती है। रात की दुर्घटना, हत्या, चोरी, विवाद, जुलूस, वीआईपी ड्यूटी, चुनाव, परीक्षा, धरना- हर जगह वही पुलिस खड़ी मिलती है। इसलिए पुलिस की आलोचना पुलिस-विरोध नहीं होनी चाहिए; वह पुलिस-सुधार की ईमानदार मांग होनी चाहिए।

लेकिन कठिनाई किसी को मनमानी का अधिकार नहीं देती। एक शिक्षक पर कार्यभार हो सकता है, पर वह बच्चे का अपमान नहीं कर सकता। एक डॉक्टर पर दबाव हो सकता है, पर वह मरीज को तिरस्कार से नहीं देख सकता। इसी तरह पुलिस पर दबाव हो सकता है, पर वह नागरिक की गरिमा छीन नहीं सकती। वर्दी अधिकार देती है, पर उससे पहले उत्तरदायित्व देती है। डंडा कानून का प्रतीक नहीं, कानून का अंतिम साधन है। पुलिस की असली शक्ति उसकी भाषा में, उसकी निष्पक्षता में, उसकी संवेदनशीलता में और उसके संयम में है।
             
 हमारे समाज में पुलिस की छवि को बदलने की आवश्यकता है। थाना ऐसा स्थान बने जहाँ कमजोर व्यक्ति भी साहस के साथ जाए। महिला अपनी शिकायत कह सके। बुजुर्ग अपमानित न महसूस करे। गरीब आदमी को यह न लगे कि बिना सिफारिश उसकी बात नहीं सुनी जाएगी। व्यापारी यह न सोचे कि हर जाँच वसूली का संकेत है। छात्र यह न माने कि पुलिस केवल भय दिखाने वाली संस्था है। यह परिवर्तन केवल आदेश से नहीं आएगा; यह प्रशिक्षण, अनुशासन, निगरानी और मानवीय दृष्टि से आएगा।
            
पुलिस सुधार का अर्थ केवल नई गाड़ियाँ, नए हथियार और नए भवन नहीं है। पुलिस सुधार का पहला अर्थ है- व्यवहार सुधार। भाषा बदलना, सुनने की आदत विकसित करना, शिकायत को गंभीरता से लेना, गिरफ्तारी को अंतिम उपाय मानना, नागरिक को अपराधी की तरह न देखना और प्रक्रिया को संविधान की आत्मा मानना। हर थाने में यह भावना होनी चाहिए कि यहाँ न्याय की शुरुआत होती है, अपमान की नहीं। हर अधिकारी को यह समझना होगा कि वह राज्य का प्रतिनिधि है, किसी निजी शक्ति का स्वामी नहीं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय इसीलिए काबिले-तारीफ है कि उसने केवल एक मामले पर टिप्पणी नहीं की, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाया। जब दंड सीधे वेतन से जुड़ता है, तब जवाबदेही व्यक्तिगत होती है। अब यह कहकर नहीं बचा जा सकेगा कि “सिस्टम ऐसा है।” सिस्टम कोई आकाश से उतरी वस्तु नहीं है; सिस्टम उन्हीं लोगों से बनता है जो कुर्सी पर बैठे हैं, आदेश लिख रहे हैं, हिरासत में रख रहे हैं, रजिस्टर भर रहे हैं और नागरिक से बात कर रहे हैं। यदि निर्णय गलत है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
         
यह फैसला पुलिस को डराने के लिए नहीं, बल्कि उसे याद दिलाने के लिए है कि कानून की रक्षा कानून तोड़कर नहीं की जा सकती। निर्दोष को पकड़ना अपराधी को पकड़ने से आसान हो सकता है, लेकिन न्याय नहीं है। कमजोर पर दबाव बनाना सरल हो सकता है, लेकिन शासन नहीं है। थाने में बैठाकर मनोवैज्ञानिक भय पैदा करना त्वरित नियंत्रण दे सकता है, लेकिन यह लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है।

आज आवश्यकता है कि राज्य सरकारें भी इस दिशा में गंभीरता से सोचें। पुलिस प्रशिक्षण में संविधान, मौलिक अधिकार, मानवाधिकार, संवाद-कौशल और नागरिक व्यवहार को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। थानों में सीसीटीवी व्यवस्था प्रभावी हो। गिरफ्तारी और हिरासत की हर प्रक्रिया डिजिटल रूप से दर्ज हो। शिकायतकर्ता को रसीद और स्थिति की जानकारी मिले। हर जिले में अवैध हिरासत और पुलिस दुर्व्यवहार की स्वतंत्र समीक्षा हो। अच्छे पुलिसकर्मियों को सम्मान मिले और गलत आचरण पर त्वरित कार्रवाई हो। सुधार केवल दंड से नहीं, आदर्श निर्माण से भी आता है।
    
जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। कानून का सम्मान नागरिक से भी अपेक्षित है। पुलिस से मर्यादित भाषा में बात करना, जाँच में सहयोग करना, झूठी शिकायत न करना, भीड़ बनाकर न्याय हाथ में न लेना- ये सब भी आवश्यक हैं।
पुलिस-जनता संबंध एकतरफा नहीं हो सकते। लेकिन शक्ति का संतुलन पुलिस के पक्ष में अधिक होता है, इसलिए जिम्मेदारी भी उसी की अधिक है। जिसके हाथ में अधिकार अधिक है, उसके आचरण में संयम भी अधिक होना चाहिए।
              
लोकतंत्र में नागरिक अपराधी नहीं, अधिकार-संपन्न व्यक्ति है। पुलिस का संबंध जनता से मालिक और प्रजा का नहीं, संरक्षक और नागरिक का होना चाहिए। वर्दी का सम्मान तभी स्थायी होगा जब वर्दी नागरिक के सम्मान को सुरक्षित रखेगी। भय से मिला सम्मान स्थायी नहीं होता; वह केवल चुप्पी पैदा करता है। सच्चा सम्मान विश्वास से जन्म लेता है।
           
आने वाले समय में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपराध से अधिक विश्वास की होगी। अपराधी से लड़ने के लिए हथियार चाहिए, लेकिन जनता का विश्वास जीतने के लिए व्यवहार चाहिए। अपराध नियंत्रण के आँकड़े महत्वपूर्ण हैं, पर नागरिक सम्मान की अनुभूति उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि जनता पुलिस को अपना मानेगी, तो सूचना देगी, सहयोग करेगी, गवाही देगी, अपराध रोकने में सहभागी बनेगी। लेकिन यदि जनता पुलिस से डरेगी, तो अपराध और पुलिस के बीच चुप्पी की दीवार खड़ी हो जाएगी।
              
यह निर्णय एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी उन लोगों के लिए जो वर्दी को मनमानी का कवच मानते हैं। अवसर उन ईमानदार पुलिसकर्मियों के लिए जो सचमुच पुलिस की छवि बदलना चाहते हैं। यह समय है कि पुलिस स्वयं आगे बढ़कर कहे- हम कानून के रखवाले हैं, कानून से ऊपर नहीं। हम जनता की रक्षा के लिए हैं, जनता को भयभीत करने के लिए नहीं। समाज को पुलिस चाहिए, लेकिन ऐसी पुलिस जो अपराधी के सामने कठोर और नागरिक के सामने संवेदनशील हो। ऐसी पुलिस जो वर्दी की शक्ति को सेवा में बदले। ऐसी पुलिस जो थाने को भय का घर नहीं, न्याय का द्वार बनाए। ऐसी पुलिस जो शिकायत सुनते समय नागरिक की आँखों में मनुष्य देखे, संदिग्ध नहीं।
            
 इलाहाबाद उच्च न्यायालय की यह आहट केवल अदालत की दीवारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह थानों के बरामदों तक पहुँचे, चौकियों के कमरों तक पहुँचे, गश्त पर निकले सिपाही तक पहुँचे, कुर्सी पर बैठे अधिकारी तक पहुँचे और उस नागरिक तक भी पहुँचे जो वर्षों से यह मानकर चुप है कि पुलिस से उलझना ठीक नहीं। अब समय है कि कानून का भय अपराधी को हो और कानून का भरोसा नागरिक को।
      
पुलिस यदि अपना व्यवहार बदलेगी, तो उसका सम्मान बढ़ेगा। यदि नहीं बदलेगी, तो आने वाले दिन सचमुच कठिन होंगे। क्योंकि अब समाज जाग रहा है, न्यायालय सजग है, कैमरा उपस्थित है और संविधान की आवाज़ पहले से अधिक स्पष्ट सुनाई दे रही है। लोकतंत्र की असली सुंदरता यही है कि वह शक्ति को भी मर्यादा में रहना सिखाता है। पुलिस जब इस मर्यादा को स्वीकार करेगी, तभी वर्दी सचमुच गरिमा का प्रतीक बनेगी-भय का नहीं।

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