इंसानों ने खो दी भीतर की शांति: जानिए क्यों प्रकृति को सिर्फ इस्तेमाल नहीं, बल्कि उसकी उपासना करना जरूरी है
मनुष्य ने बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो हासिल कर लीं, लेकिन प्रकृति रूपी जीवन के सबसे बड़े विश्वविद्यालय को पढ़ना भूल गया। डॉ. विनय कुमार वर्मा का यह विशेष लेख आपको जीवन जीने का असली और अनमोल सलीका सिखाएगा।
प्रकृति है परमात्मा की खुली पुस्तक
नदियों और वृक्षों से सीखें चरित्र
इंसान का पहला गुरु है प्रकृति
बढ़ गया ज्ञान पर घटा बोध
प्रकृति की रक्षा ही असली आत्मरक्षा
हम इंसान अपनी जिंदगी में न जाने कितनी ही किताबें लिखते और पढ़ते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस पूरी कायनात को बनाने वाले परमात्मा ने भी एक किताब रची है? भगवान की लिखी वह सबसे महान और खूबसूरत किताब कोई और नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति है।
इंसान की लिखी किताबों को पढ़ने के लिए हमें स्कूल जाना पड़ता है, अक्षर सीखने पड़ते हैं। लेकिन भगवान की इस अनोखी और विशाल प्रकृति रूपी किताब को पढ़ने के लिए किसी डिग्री की जरूरत नहीं है। इसके लिए बस एक जागा हुआ दिल, चीजों को महसूस करने वाली नजर और एक शांत मन चाहिए।
जिस इंसान ने इस प्रकृति को पढ़ना और समझना सीख लिया, समझो उसने बिना किसी स्कूल-कॉलेज गए दुनिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय से ज्ञान पा लिया। इसके उलट, जो इंसान इस कुदरत को समझे बिना अपनी जिंदगी गुजार देता है, वह दुनिया भर की तमाम डिग्रियां पाकर भी जीवन के असली और मूल ज्ञान से हमेशा अनजान ही रह जाता है।

प्रकृति के हर पन्ने पर छुपा है ज्ञान
कुदरत की यह किताब वाकई बहुत जादुई और अनोखी है। इसके पन्ने समय के साथ कभी पीले नहीं पड़ते और न ही इसके शब्द कभी पुराने होते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी भाषा को समझने के लिए हमें किसी ट्रांसलेटर या अनुवादक की भी जरूरत नहीं पड़ती। यह सीधे दिल से दिल तक बात करती है।
अगर ध्यान से देखें, तो बदलते हुए मौसम इस किताब के अलग-अलग अध्याय हैं। कलकल बहती हुई नदियां इसके सुंदर वाक्य हैं और ऊंचे-ऊंचे खड़े पर्वत इसके विराम-चिह्न हैं। हरे-भरे पेड़ इसके श्लोक की तरह हैं, चहकते हुए पक्षियों की आवाज इसकी सुंदर कविता है और सुबह-सुबह उगता हुआ सूरज इस किताब का सोने के अक्षरों में लिखा पहला पन्ना है।
इंसान ने सदियों में लाखों किताबें लिखीं, जिनमें इतिहास, विज्ञान, धर्म, राजनीति और न जाने क्या-क्या रच डाला। लेकिन इन सब बातों का असली जरिया और प्रेरणा हमारी प्रकृति ही है। उड़ते पक्षियों को देखकर इंसान ने हवाई जहाज बनाया, नदियों के किनारे बस्तियां बसाईं और मधुमक्खियों से मिलकर काम करना सीखा। इसलिए प्रकृति ही हमारी पहली गुरु है।

ज्ञान तो बढ़ा, पर भीतर का बोध घट गया
आज के आधुनिक दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इंसान ने कागज की किताबें पढ़ते-पढ़ते उस असली किताब को पढ़ना छोड़ दिया है, जिससे सारी विधाएं पैदा हुई थीं। आज हमारे पास जानकारी और सूचनाएं तो बहुत बढ़ गई हैं, लेकिन चीजों को गहराई से महसूस करने की हमारी क्षमता बहुत कम हो गई है।
हमने दुनिया का नक्शा तो रट लिया है, लेकिन जिस धरती पर हम रहते हैं, उसके दिल को समझना भूल गए। हमने आसमान की दूरी तो नाप ली, पर आसमान जैसी बड़ी सोच अपने भीतर नहीं ला पाए। यही वजह है कि आज इंसान के पास सुख-सुविधा के तमाम साधन होने के बाद भी मन की असली शांति गायब होती जा रही है।
कुदरत कभी किसी मंच पर खड़े होकर भाषण या उपदेश नहीं देती, वह चुप रहकर अपने होने से ही हमें सब कुछ सिखा देती है। सूरज रोज बिना किसी शोर-शराबे के उगता है और हमें अपने काम में जुटने का संदेश देता है। पेड़ बिना किसी स्वार्थ के हमें मीठे फल देते हैं और परोपकार का असली मतलब समझा जाते हैं।
एक छोटे से बीज का बहुत बड़ा सबक
प्रकृति हमें कभी यह नहीं कहती कि "तुम मेरे जैसे बन जाओ", वह बस अपना काम पूरी ईमानदारी से करती रहती है। ऋषि-मुनियों ने भी इसीलिए अपने आश्रम शहरों के बीच नहीं बल्कि घने जंगलों में बनाए थे। वे जानते थे कि इंसान को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि इस सृष्टि का व्यावहारिक ज्ञान भी मिलना चाहिए।
कभी किसी छोटे से बीज को हथेली पर रखकर ध्यान से देखिए। उसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि इस नन्हे से दाने के भीतर एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ छुपा हुआ है। वह बीज मिट्टी के नीचे दबता है, खुद को पूरी तरह गलाता है और अपना अस्तित्व खो देता है, तब जाकर एक विशाल पेड़ बनता है।
अगर वह बीज यह सोच ले कि मिट्टी के नीचे दबना उसका अपमान है, तो वह कभी पेड़ नहीं बन पाएगा। कुदरत हमें यहाँ जीवन का सबसे बड़ा सूत्र देती है कि जो इंसान अपने अहंकार को मिटाने का हौसला रखता है, वही जिंदगी में सबसे ज्यादा तरक्की करता है और दूर-दूर तक फैलता है।
नदी और वृक्षों से सीखें चरित्र की ताकत
जरा बहती हुई नदी को देखिए, वह किसी एक जगह रुककर अपना हक नहीं जताती। वह बस लगातार आगे बहती रहती है। रास्ते में चाहे बड़ी चट्टानें आएं, गहरी खाइयां मिलें या सूखा मैदान, वह कभी किसी से शिकायत नहीं करती। वह अपना रास्ता तो बदल सकती है, लेकिन आगे बढ़ने का अपना स्वभाव कभी नहीं बदलती।
इसमें हमारे लिए बहुत बड़ा संदेश छुपा है। जिंदगी में हमारे हालात कैसे भी बदल जाएं, लेकिन हमारा अच्छा चरित्र और स्वभाव कभी नहीं बदलना चाहिए। आज इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि पैसा, पद या सफलता मिलते ही उसका व्यवहार अपनों के प्रति बदल जाता है, जबकि प्रकृति हमें हमेशा एक समान रहना सिखाती है।
इसी तरह पेड़ों को देखिए, वे धरती से जितना लेते हैं, उससे कहीं ज्यादा हमें लौटा देते हैं। वे हमें छाया, फल, शुद्ध हवा और पक्षियों को आशियाना देते हैं। कुदरत का कोई भी हिस्सा सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नहीं जीता। केवल इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जिसने "मेरा और तेरा" करके अपने चारों तरफ नफरत की दीवारें खड़ी कर ली हैं।
सूरज की निष्पक्षता ही असली दिव्यता है
सुबह जब सूरज उगता है, तो वह कभी यह भेद नहीं करता कि कौन उसकी पूजा कर रहा है और कौन उसे गाली दे रहा है। उसकी रोशनी मंदिर पर भी उतनी ही पड़ती है और मस्जिद पर भी। वह महल और झोपड़ी दोनों को एक समान उजाला देता है। हवा कभी किसी का धर्म या जाति पूछकर उसे सांस नहीं देती, न हीं बारिश अमीर-गरीब का फर्क देखती है।
यह निष्पक्षता ही असल में भगवान का रूप है। प्रकृति का हर हिस्सा बिना किसी भेदभाव के सिर्फ देना जानता है। इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि अगर परमात्मा को महसूस करना है, तो उसकी बनाई इस सुंदर सृष्टि को देखो। जो इंसान एक खिले हुए फूल में खूबसूरती नहीं देख सकता, वह मंदिर की मूरत में भगवान को कैसे ढूंढेगा?
प्रकृति सिर्फ हमारे बाहर नहीं है, वह हमारे भीतर भी है। हमारी धड़कनों में नदियों की रफ्तार है, हमारी सांसों में बहती हवा का अहसास है, हमारी आंखों में आसमान जैसी गहराई है और हमारा यह शरीर भी इसी मिट्टी के तत्वों से बना है। इसलिए भारतीय दर्शन कहता है- "यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे", यानी जो इस छोटे से शरीर में है, वही इस पूरे ब्रह्मांड में है।
उपयोग नहीं, उपासना का रिश्ता बनाएं
जब-जब इंसान ने कुदरत से नाता तोड़ा है, उसने अपने भीतर की सुख-शांति को भी खो दिया है। आज हमारे पास कंक्रीट की ऊंची इमारतें तो हैं, लेकिन खुला आसमान देखने की फुर्सत नहीं है। एयर कंडीशनर वाले कमरे तो हैं, लेकिन बागों की ठंडी हवा नसीब नहीं होती। आज इंसान मंगल ग्रह पर जीवन ढूंढ रहा है, लेकिन जहां जीवन है, उस धरती को खुद अपने हाथों से तबाह कर रहा है।
हम फूलों का वैज्ञानिक नाम तो जानते हैं, लेकिन उसकी खुशबू को महसूस करना भूल गए हैं। हमारा प्रकृति के साथ रिश्ता सिर्फ लालच और उपयोग का हो गया है, जबकि यह रिश्ता सम्मान और उपासना का होना चाहिए। जिस पेड़ की छांव में हम बैठते हैं, उसे काटने से बचना और जिस नदी का पानी हम पीते हैं, उसे गंदा न करना ही प्रकृति की सच्ची पूजा है।
मंदिरों में दीया जलाना या घंटियां बजाना बहुत आसान है, लेकिन धरती को हरा-भरा रखना और बेजुबान पक्षियों के घरों को बचाना असली परीक्षा है। अगर हमारी भक्ति हमें पर्यावरण की रक्षा करना नहीं सिखाती, तो वह भक्ति अभी अधूरी है। हमारी संस्कृति ने इसीलिए पेड़, पौधों, नदियों और पहाड़ों को भगवान का दर्जा दिया था ताकि हम उनका सम्मान करें, उनका शोषण न करें।
प्रकृति को हमारी नहीं, हमें उसकी जरूरत है
आखिर में एक बात हमें हमेशा याद रखनी होगी कि इस प्रकृति को हमारी कोई जरूरत नहीं है, बल्कि हमें जिंदा रहने के लिए इस प्रकृति की सख्त जरूरत है। अगर कल को दुनिया से सारे इंसान खत्म भी हो जाएं, तो भी सूरज उगेगा, नदियां बहेंगी और हवाएं चलेंगी। लेकिन अगर कुदरत का संतुलन बिगड़ गया, तो इंसान का नामोनिशान इस धरती से मिट जाएगा।
इसलिए पर्यावरण को बचाना सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम या फैशन नहीं है, बल्कि यह हमारी खुद की जान बचाने का एकमात्र रास्ता है। कभी सुबह जल्दी उठकर किसी पेड़ के नीचे शांत बैठकर देखिए, आपको महसूस होगा कि हवाएं, पत्तियां और पक्षी आपसे कुछ कह रहे हैं। परमात्मा कभी शोर में नहीं, बल्कि कुदरत के इसी गहरे मौन और सुकून में मिलता है।
अगर जीवन का असली सच समझना है, तो अपनी बंद किताबों को कुछ देर के लिए अलग रखिए और इस खुली हुई कुदरत की तरफ देखिए। बहती हुई नदी, फल से झुकी डाल और सबका बोझ उठाने वाली धरती को देखकर जब आप जीना सीख जाएंगे, तब आपको किसी सबूत की जरूरत नहीं होगी कि भगवान है या नहीं। आपके लिए कुदरत का हर पत्ता एक मंत्र और हर नदी साक्षात गीता बन जाएगी।
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