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कैलिफोर्निया वंडर और येलो वंडर: रंगीन शिमला मिर्च की खेती से किसान कमाएं दमदार मुनाफा

शिमला मिर्च की खेती, विशेषकर रंगीन किस्में, किसानों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। बेहतर बाजार मूल्य और उच्च पोषण के कारण इसकी मांग होटल और निर्यात बाजारों में हमेशा बनी रहती है।

 
 

हरी शिमला मिर्च से अधिक बाजार मूल्य

प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल तक उपज

रोपाई के 60-70 दिन बाद तुड़ाई

उन्नत किस्मों से बंपर उत्पादन का मौका

विटामिन-सी और आवश्यक खनिजों से भरपूर

शिमला मिर्च की खेती वर्तमान में किसानों के लिए एक उभरती हुई लाभकारी फसल बन चुकी है। कृषि विज्ञान केंद्र, कासगंज के वैज्ञानिक डॉ. अंकित सिंह भदौरिया के अनुसार, विशेष रूप से हरी, पीली और लाल रंगों की शिमला मिर्च की बाजार में जबरदस्त मांग है। इसका उपयोग न केवल घरेलू सब्जियों में, बल्कि फास्ट फूड, सलाद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में भी व्यापक रूप से किया जा रहा है। पोषण के लिहाज से भी यह बेहद समृद्ध है; 100 ग्राम ताजा शिमला मिर्च में विटामिन-ए, विटामिन-सी के साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम जैसे आवश्यक खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

मिट्टी का चयन और उपयुक्त जलवायु
 शिमला मिर्च की सफल खेती के लिए 20-30 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। फसल की वृद्धि के लिए मध्यम आर्द्रता वाली जलवायु अच्छी होती है, जबकि अत्यधिक गर्मी या पाला इसकी उपज को प्रभावित कर सकता है। खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेहतरीन मानी जाती है। वैज्ञानिक रूप से मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए ताकि पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिल सकें।

उन्नत किस्में और बीज की मात्रा 
अधिक पैदावार और बेहतर गुणवत्ता के लिए सही किस्मों का चुनाव करना सबसे अहम है। प्रमुख उन्नत और संकर किस्मों में कैलिफोर्निया वंडर (लाल), येलो वंडर (पीला), अरका गौरव (पीला), अरका मोहिनी (हरा) और अरका बसंत (पीला) शामिल हैं। एक हेक्टेयर क्षेत्र में खेती के लिए लगभग 250-300 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। बीज को प्रो-ट्रे में बोने और बीजोपचार करने से पौधों में रोगों का खतरा काफी कम हो जाता है।

रोपाई और पोषक तत्व प्रबंधन का वैज्ञानिक तरीका
 नर्सरी में बीज बोने के 25-30 दिन बाद पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। पौधों की रोपाई 45x45 सेंटीमीटर की दूरी पर करनी चाहिए। खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसके अलावा, 120 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फास्फोरस और 60 किग्रा पोटाश का प्रयोग संतुलित मात्रा में करना आवश्यक है। नाइट्रोजन को विभाजित मात्रा में देने से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और बंपर उत्पादन मिलता है।

स्वस्थ फसल के लिए सिंचाई और रोगों से बचाव 
शिमला मिर्च की फसल को गर्मियों में 6 से 7 दिन और सर्दियों में 10 से 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई जरूरी है। फसल को एफिड, थ्रिप्स और फलछेदक कीटों के साथ-साथ झुलसा, मोजेक और डैम्पिंग-ऑफ जैसे रोगों से बचाने के लिए समन्वित कीट-रोग प्रबंधन अपनाना चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में एक हेक्टेयर से 200-250 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है। रोपाई के लगभग 60-70 दिन बाद तुड़ाई शुरू की जा सकती है, जिससे किसानों को निरंतर आय प्राप्त होती है।

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