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कबीर जयंती विशेष: सोशल मीडिया और आधुनिक उपभोगवाद के इस दौर में क्यों सबसे ज्यादा जरूरी हैं संत कबीर?

संत कबीरदास केवल एक कवि या समाज सुधारक नहीं, बल्कि एक शाश्वत चेतना हैं। आज तकनीक और दिखावे के युग में कबीर का निर्गुण दर्शन, मानवता का संदेश और आत्मबोध का मार्ग इंसानी मन को सच्ची शांति देने में पूरी तरह सक्षम है।

 
 

शब्दों से परे चेतना का नाम कबीर

पाखंड और सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार

किताबों से नहीं जीवन से सीखा ज्ञान

अहंकार मिटाने से मिलता है सच्चा प्रेम

संतोष और संतुलन का अद्भुत जीवन दर्शन

कबीरदास! यह एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही आँखों के सामने एक ऐसी अडिग और सच्ची ज्योति उभरती है, जिसकी रोशनी में समाज के सारे पाखंड, अंधविश्वास और भेदभाव के अंधेरे गायब हो जाते हैं। कबीर को केवल एक कवि, संत या समाज-सुधारक के दायरे में बांधना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वे वास्तव में एक जागती हुई चेतना हैं, समाज की कुरीतियों पर एक तीखा प्रश्न हैं और हर युग के लिए एक बड़ा जागरण हैं। वे उस आवाज का नाम हैं जो शब्दों के पार जाकर सीधे इंसान के दिल पर चोट करती है।

जुलाहे के घर से उठी क्रांति की मशाल
काशी (वाराणसी) की गलियों में नीरू और नीमा नाम के एक सीधे-सादे जुलाहा दंपति के घर पले-बढ़े कबीरदास ने किसी बड़े विश्वविद्यालय में शिक्षा नहीं ली। उनका जीवन ही उनका सबसे बड़ा गुरु और उनकी कविता थी। वे अपने करघे पर बैठकर केवल धागे नहीं बुनते थे, बल्कि उस काल में जाति और मजहब के नाम पर आपस में टूटते इंसानी रिश्तों को भी जोड़ने का ताना-बाना बुनते थे। उनके करघे की आवाज में से ही जीवन का सबसे अनमोल दर्शन जन्म लेता था। कबीर ने कभी वेदों या धर्मग्रंथों की रटी-रटाई व्याख्या नहीं की, बल्कि उन्होंने जीवन की कड़वी सच्चाई को जिया और परखा। वे अच्छी तरह जानते थे कि असली ज्ञान किताबों में बंद नहीं होता, वह तो खुले आसमान की तरह हर इंसान के अनुभव में छिपा होता है।

खोखले ज्ञान पर प्रेम की सबसे बड़ी चोट
कबीरदास ने समाज के उस वर्ग को सबसे ज्यादा चुनौती दी जो केवल बड़ी-बड़ी किताबें पढ़कर खुद को ज्ञानी समझता था, लेकिन उसके मन में करुणा और दया का कोई स्थान नहीं था। उनका साफ मानना था कि जिस ज्ञान में प्रेम की भावना न हो, वह सिर्फ एक बेजान सूचना है। आज के समय में भी उनका यह दोहा सबसे ज्यादा सटीक बैठता है—
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”
यह बात हमें सिखाती है कि अगर हम किसी से सच्चा प्रेम और सहानुभूति नहीं रख सकते, तो हमारी सारी शिक्षा बेकार है।

अयोध्या या काशी नहीं, मन के भीतर बसता है राम
ईश्वर को लेकर कबीर का नजरिया बहुत ही अलग और गहरा था। आम इंसान भगवान को किसी मूर्ति, मंदिर या आकार में खोजना चाहता है, लेकिन कबीर निर्गुण और निराकार ईश्वर के उपासक थे। कबीर का राम किसी खास शहर की सीमा में बंधा नहीं है, न ही वह किसी मस्जिद या मंदिर की चारदीवारी में कैद है। उनका राम तो हवा की उस खुशबू की तरह है जिसे आँखों से देखा नहीं जा सकता, मगर पूरी गहराई से महसूस किया जा सकता है। ईश्वर का पता बताते हुए वे कहते हैं—
“मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में। ना मैं देवल, ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में॥”
इस माध्यम से कबीर इंसानों को खुद के भीतर झांकने की सलाह देते हैं।

जाति और धर्म की दीवारों पर निर्भीक प्रहार
आज का आधुनिक समाज भी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बुरी तरह बंटा हुआ है। सोशल मीडिया के इस दौर में लोग अपनी पहचान के नाम पर दूसरों से नफरत करने लगे हैं। ऐसे माहौल में कबीर की वाणी किसी ठंडे और साफ झरने की तरह मन को सुकून देती है। कबीर ने जातिवाद पर प्रहार करते हुए कहा था—
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥”
उन्होंने धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले पंडितों और मौलवियों, दोनों को बिना किसी डर के आईना दिखाया। उनका विरोध किसी मजहब से नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर फैलाए जाने वाले अहंकार से था।

आज के सोशल मीडिया युग में कबीर की जरूरत
आज इंसान तकनीक के शिखर पर है, इंटरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया से जुड़ा है, पर अंदर से बेहद अकेला है। हमारे पास फेसबुक-व्हाट्सएप पर हजारों संपर्क हैं, लेकिन दिल से जुड़ा कोई सच्चा संबंध नहीं है। कबीर का संतोष का नियम आज की भागदौड़ भरी जिंदगी को संतुलित करना सिखाता है, जहाँ वे कहते हैं—
“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥”
यह इच्छाओं की अति को रोककर सहज जीवन जीने की कला है। कबीर को पढ़ना केवल साहित्य पढ़ना नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा की शुद्धि करना है। कबीर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पाँच सौ साल पहले थे, क्योंकि वे किसी पन्ने पर नहीं, बल्कि समाज के बीच एक गूंज बनकर जीवित हैं।

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