आखिरकार मोदी जी क्यों नहीं बाँट देते सबको 15-15 लाख रुपये, क्या होगा इसका देश पर साइड इफेक्ट ?
क्या सरकार सबको 15-15 लाख देकर गरीबी मिटा सकती है? डैडी इंटरनेशनल स्कूल के डॉ. विनय प्रकाश तिवारी के इस विशेष विश्लेषण में जानिए, कैसे मुफ्त पैसा बांटना देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है।
140 करोड़ भारतीयों को 15 लाख देने का गणित
बाजार में पैसों की बाढ़ और महंगाई का संकट
जिम्बाब्वे और वेनेजुएला जैसे आर्थिक संकट का डर
उत्पादन और कौशल विकास ही असली समृद्धि का रास्ता
मुफ्त राशि बनाम सरकारी जनकल्याणकारी योजनाएं
देश में जब भी आर्थिक संकट, महंगाई या बेरोजगारी की चर्चा होती है, तो सोशल मीडिया से लेकर चौपालों तक एक सवाल अक्सर गूँजता है— "अगर सरकार चाहे तो हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपये क्यों नहीं डाल देती?" आम जनता को लगता है कि सरकार के पास असीमित पैसा है और वह एक झटके में सबकी गरीबी दूर कर सकती है। लेकिन क्या वास्तव में यह इतना सरल है?
डैडी इंटरनेशनल स्कूल, चंदौली के संस्थापक डॉ. विनय प्रकाश तिवारी ने इस विषय का गहन विश्लेषण किया है और बताया है कि ऐसा करना देश के लिए किसी वरदान के बजाय अभिशाप साबित हो सकता है।
15 लाख का भारी-भरकम गणित
भारत की वर्तमान आबादी लगभग 140 करोड़ है। डॉ. तिवारी बताते हैं कि यदि सरकार हर व्यक्ति को 15 लाख रुपये देने का फैसला करती है, तो इसके लिए कुल 2100 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। यह राशि भारत के कुल सालाना बजट से भी कई गुना अधिक है। सरकार की आय का मुख्य स्रोत टैक्स, जीएसटी और अन्य कर होते हैं, जिनसे देश का बुनियादी ढांचा, सेना और स्वास्थ्य सेवाएं चलती हैं। इतनी बड़ी रकम का प्रावधान करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
मुद्रास्फीति (Inflation) का बढ़ता खतरा
मान लीजिए सरकार नोट छापकर यह पैसा बाँट भी दे, तो इसका सबसे पहला असर 'मुद्रास्फीति' के रूप में दिखेगा। डॉ. तिवारी के अनुसार, "जब हर व्यक्ति के पास लाखों रुपये होंगे, तो बाजार में मांग अचानक बढ़ जाएगी, लेकिन उत्पादन (Production) स्थिर रहेगा। ऐसी स्थिति में सामान कम और खरीदार ज्यादा होंगे, जिससे कीमतें आसमान छूने लगेंगी।" उदाहरण के तौर पर, जो दूध आज 60 रुपये लीटर है, वह 500 या 1000 रुपये लीटर तक पहुँच सकता है। पैसा पास होने के बावजूद उसकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) खत्म हो जाएगी।
वैश्विक उदाहरण: जिम्बाब्वे और वेनेजुएला का संकट
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश ने अत्यधिक नोट छापकर समस्या सुलझानी चाही, वहां की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। जिम्बाब्वे में स्थिति ऐसी हो गई थी कि लोगों को ब्रेड खरीदने के लिए बोरे भरकर नोट ले जाने पड़ते थे। वेनेजुएला में भी लोग कागजी तौर पर लखपति थे, लेकिन वे एक समय का भोजन तक नहीं खरीद पा रहे थे। डॉ. विनय प्रकाश तिवारी चेतावनी देते हैं कि बिना उत्पादन बढ़ाए पैसा बांटना देश को दिवालियापन की ओर ले जाता है।
उत्पादन और कौशल: असली समृद्धि का आधार
डॉ. तिवारी का मानना है कि देश तब अमीर बनता है जब वहां का युवा हुनरमंद होता है और उत्पादन बढ़ता है। सरकारें इसीलिए 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया' और 'स्टार्टअप इंडिया' जैसी योजनाओं पर जोर देती हैं ताकि लोग आत्मनिर्भर बनें। मुफ्त पैसा बांटने से कार्य संस्कृति प्रभावित होगी; लोग मेहनत करना छोड़ देंगे, जिससे देश की उत्पादकता गिर जाएगी।
असली '15 लाख' क्या है?
भारत जैसे युवा राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी संपत्ति मुफ्त की राशि नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सही कौशल (Skill) है। डॉ. तिवारी संदेश देते हैं कि जिस दिन देश का युवा निवेश, तकनीक और व्यवसाय को समझने लगेगा, वह खुद 15 लाख से कहीं अधिक कमाने की क्षमता विकसित कर लेगा। राष्ट्र की असली ताकत उसकी जनता की कार्यक्षमता में निहित है, न कि सरकार से मिलने वाले मुफ्त अनुदान में।
ये डॉ. विनय प्रकाश तिवारी, संस्थापक – डैडी इंटरनेशनल स्कूल एंड हॉस्टल, बिशुनपुरा कांटा, चंदौली के निजी विचार और विश्लेषण है।
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