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लतीफ शाह की दरगाह पर लगा मेला, हजारों की संख्या में पहुंचे लोग
पवित्रा दरगाह पर आज गुरुवार को हजारों की संख्या में जायरीन जियारत करने पहुंचे और खूब मस्ती से ऐतिहासिक मेले का आनंद उठाया।
 

 

चकिया कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कौड़िहार गांव के समीप कर्मनाशा नदी तट पर स्थित बाबा लतीफ शाह की पवित्र पावन मजार जनपद की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है। कौमी एकता के प्रतीक बाबा लतीफ शाह की मजार पर हिंदू मुस्लिम सद्भावना की सच्ची मिसाल है। पवित्रा दरगाह पर आज गुरुवार को हजारों की संख्या में जायरीन जियारत करने पहुंचे और खूब मस्ती से ऐतिहासिक मेले का आनंद उठाया। आपको बताते चलें कि कोरोना काल के बाद पहली बार ऐतिहासिक मेले का आयोजन किया गया जिसमें मेले का लुत्फ उठाने एवं दरगाह पर जियारत करने के लिए हजारों की संख्या में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग पहुंचे और खूब मेले का आनंद उठाया। वहीं मेले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से चप्पे-चप्पे प्रशासन और पुलिस प्रशासन पूरी तरह चौकन्ना एवं अलर्ट रही जिससे डैम एवं मजार के पास किसी भी प्रकार की कोई घटना दुर्घटना ना हो सके।

चाट, पकौड़ी एवं गुरही जलेबी का लोगों ने खूब उठाया लुफ्त
बाबा लतीफ शाह के मेले में पहुंचे हजारों की संख्या में लोगों ने बाबा लतीफ शाह की मजार पर जियारत करने एवं बाबा बनवारी दास के मंदिर पर पूजा अर्चना करने के बाद मेले का खूब लुत्फ उठाया इस दौरान गरमा गरम गुरही जलेबी एवं चाट पकौड़ी इत्यादि का भी खूब जमकर आनंद लिया। इसके अलावा बच्चों ने भी मेले में खिलौने एवं महिलाओं ने भी अन्य सामानों की खरीदारी की।

मेले में पहुंचकर अधिकारियों ने लिया जायजा
बाबा लतीफ शाह की मजार पर लगे मेले में सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे वही समय समय पर पहुंचकर अधिकारियों द्वारा भी जायजा लिया जा रहा था। वहीं शाम को 5:00 बजे पहुंचे उपजिलाधिकारी ज्वाला प्रसाद यादव, पुलिस क्षेत्राधिकारी राजेश राय एवं कोतवाल राजेश यादव द्वारा मौके पर पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया गया एवं आवश्यक दिशा निर्देश दिए गए।

आपको बता दें कि लतीफ शाह का पूरा नाम सैयद अब्दुल लतीफ शाह बरी था। ईरान देश के बरी नामक गांव में उनका जन्म हुआ था। बचपन में ही साकार ब्रह्मा के तत्व ज्ञान ढूंढने के लिए वह सन्यासी बन गए। अकबर के शासन काल में कट्टरपंथ से परहेज किए जाने की बात सुनकर वे भारत आ गए। अजमेर शरीफ में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के तत्कालीन गद्दीनशी की सलाह पर वह काशी आए। प्रेम सौहार्द असमर्थता और धार्मिक प्रवृत्ति के चलते इनके पीछे पिक्चर की एक बड़ी जमात खड़ी हो गई। बाद में वह चकिया क्षेत्र में कर्मनाशा नदी के किनारे आकर रहने लगे।

संतों में श्रेष्ठ माने जाते हैं बाबा लतीफ शाह
कर्मनाशा नदी के किनारे उसी स्थान पर दादा बनवारी दास नामक हिंदू संत है रहा करते थे वह बड़े ही तपस्वी और विद्वान थे। दोनों संत साथ साथ हिंदू मुस्लिम एकता का संदेश देते थे। अगर दंतकथा की माने तो बाबा बनवारी दास के दिलो-दिमाग में खुद के श्रेष्ठता की भावना उत्पन्न हो गई और बाबा लतीफ शाह से कर्मनाशा की तीव्र धारा को पानी के ऊपर से चलकर पार करने की पेशकश रख दी। नदी पार करते समय बाबा बनवारी लाल नदी के अंदर चले गए। जबकि बाबा लतीफ शाह ने पानी के ऊपर से चलकर नदी पार कर ली। तभी से बाबा लतीफ शाह को श्रेष्ठ संत होने का दर्जा मिला।

तीन दिवसीय मेले की रखी गई परंपरा
लतीफ शाह बाजार के निर्माण के साथ ही नसीब था लेने की परंपरा के पूर्व काशी नरेश में रखी। तीज के तीसरे दिन तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता है। कौमी एकता के प्रतीक इस ऐतिहासिक मेले में हिंदू और मुसलमान बड़ी ही संख्या में शिरकत करते हैं। और खूब जमकर लुफ्त उठाते हैं।

मजार के समीप है बाबा बनवारी दास स्थल
बाबा बनवारी दास का भी स्थल मजार के पास ही है। दोनों मजारों पर हिंदू और मुसलमान की एकता का संदेश देते हैं। श्रद्धालु पूर्व प्रधान चुनाव में दोनों स्थानों पर पहुंचकर माथा टेकते हैं।

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