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बुद्ध कथा में गूंजा युवराज सिद्धार्थ के वैराग्य का प्रसंग; शादी के बाद भी कैसे सत्य की खोज में निकल पड़े भगवान बुद्ध, सुन भावुक हुए भक्त

चंदौली के सैदूपुर में आयोजित पांच दिवसीय बुद्ध धम्म देशना कथा के तीसरे दिन भन्ते बंदना ने युवराज सिद्धार्थ के वैराग्य और राजकुमारी यशोधरा संग उनके विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुन श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।

 
 

सैदूपुर में पांच दिवसीय बुद्ध कथा

भन्ते बंदना ने किया विस्तृत वर्णन

सिद्धार्थ और यशोधरा का विवाह प्रसंग

जीवों पर अत्याचार देख विचलित मन

कथा सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

चंदौली जिला अंतर्गत चकिया तहसील के बुद्ध विहार महामाया सरोवर सैदूपुर के तत्वावधान में पांच दिवसीय संगीतमय सनातनी बुद्ध धम्म देशना कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस धार्मिक महोत्सव के तीसरे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा के तीसरे दिन बिहार के बोधगया से पधारीं प्रख्यात कथावाचिका भन्ते बंदना ने व्यासपीठ से भगवान बुद्ध के बाल्यकाल से लेकर उनके युवावस्था तक के विभिन्न प्रेरक जीवन प्रसंगों का अत्यंत विस्तृत और मार्मिक वर्णन किया।

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बचपन से ही चिंतनशील थे राजकुमार सिद्धार्थ
श्रद्धालुओं को ज्ञान की गंगा में गोता लगवाते हुए कथावाचिका ने बताया कि बचपन से ही राजकुमार सिद्धार्थ का स्वभाव अन्य बालकों की तुलना में अत्यंत शांत, करुणामय और चिंतनशील था। उनके अलौकिक व्यक्तित्व में दया, निश्छल प्रेम और संवेदनशीलता के गुण साफ तौर पर दिखाई देते थे।

उन्होंने आगे कहा कि युवराज सिद्धार्थ अन्य आम राजकुमारों की तरह महल की सांसारिक सुख-सुविधाओं, भोग-विलास और ऐश्वर्य में बिल्कुल भी रुचि नहीं लेते थे। उनका मन अक्सर जीवन के वास्तविक उद्देश्य और मानव दुखों के मूल कारणों को खोजने और उन पर गहराई से विचार करने में लगा रहता था।

सिद्धार्थ की विरक्ति देख पिता शुद्धोधन की बढ़ी चिंता
राजकुमार सिद्धार्थ के इन वैराग्यपूर्ण विचारों और सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्ति की भावना को देखकर उनके पिता राजा शुद्धोधन हमेशा गहरे असमंजस और चिंता में डूबे रहने लगे। उन्हें हमेशा यह डर सताता था कि सिद्धार्थ कहीं राजपाट और वैभव को छोड़कर संन्यास का कठिन मार्ग न चुन लें।

इसी बड़ी चिंता के निवारण के लिए राजा शुद्धोधन ने बेहद कम आयु में ही सिद्धार्थ का विवाह सुंदर राजकुमारी यशोधरा के साथ संपन्न कराने का फैसला किया। इस विवाह के शुभ अवसर पर पूरे कपिलवस्तु राज्य को दुल्हन की तरह भव्य रूप से सजाया गया था।

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विवाह के बाद भी सत्य की खोज में लगा रहा अंतर्मन
कथा के दौरान यशोधरा संग विवाह प्रसंग का संगीतमय वर्णन करते हुए भन्ते बंदना ने बताया कि उस समय राजमहल से लेकर नगर की तमाम गलियों तक उत्सव और हर्षोल्लास का अनूठा वातावरण बन गया था। प्रजा ने मंगलगीत गाए, घी के दीप प्रज्ज्वलित किए और अपने प्रिय राजकुमार के विवाह की खुशियां मनाई थीं।

राजा शुद्धोधन को पूरा विश्वास था कि सुंदर पत्नी और पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने के बाद सिद्धार्थ का मन सांसारिक मोह-माया में पूरी तरह रम जाएगा। हालांकि, इसके विपरीत सिद्धार्थ का अंतर्मन निरंतर मानव कल्याण, जीव रक्षा और परम सत्य की खोज की ओर ही लगातार आकर्षित होता रहा।

इस दृश्य ने बदल दिया युवराज सिद्धार्थ का जीवन
कथा को आगे बढ़ाते हुए कथावाचिका ने उस मुख्य घटना का जिक्र किया जिसने सिद्धार्थ को बुद्ध बना दिया। एक दिन भ्रमण के दौरान युवराज सिद्धार्थ ने प्रकृति के बीच जीवन का एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने उनके कोमल मन को गहराई तक झकझोर कर रख दिया। उन्होंने देखा कि इस संसार में एक बड़ा जीव अपने से छोटे जीव का क्रूरता से शिकार कर रहा है।

हर तरफ हिंसा, भय और कमजोरों पर ताकतवरों का अत्याचार देखकर उनका कोमल हृदय करुणा और पीड़ा से भर उठा। उन्होंने महसूस किया कि इस संपूर्ण संसार में केवल दुख, संताप और असमानता व्याप्त है, जिसका स्थाई समाधान खोजना मानव जाति के लिए परम आवश्यक है।

भगवान बुद्ध ने दुनिया को दिया करुणा और अहिंसा का संदेश
यही मर्मस्पर्शी घटनाएं आगे चलकर युवराज सिद्धार्थ के जीवन में वैराग्य और अटूट सत्य की खोज का मुख्य आधार बनीं। मानव मात्र के समस्त सांसारिक दुखों को दूर करने और वैश्विक शांति का मार्ग खोजने की भावना उनके भीतर दिन-प्रतिदिन प्रबल होती चली गई। इसके बाद ही वे कठिन साधना कर भगवान बुद्ध कहलाए और पूरी दुनिया को करुणा, अहिंसा, मैत्री व मानवता का अमर संदेश दिया।

इस पावन और भव्य धार्मिक अवसर पर डॉ. गीता शुक्ला, बुद्ध प्रताप मौर्य, मनगोई बौद्ध, गौरीशंकर मौर्य, लालजी, नंदलाल, नंदलाल शास्त्री, श्रीकांत मौर्य, रमाकांत पाल, चक्रधारी वर्मा, शकुंतला देवी, श्यामा देवी, सुमित्रा नवज्योति, खुशी मौर्य सहित चंदौली और चकिया क्षेत्र के तमाम बौद्ध अनुयायी और श्रद्धालु मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

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