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तेंदू पत्ता मजदूरों का शोषण: महंगाई के दौर में भी नहीं बढ़ी मजदूरी, अजय राय ने उठाई तत्काल भुगतान की मांग

महंगाई के इस दौर में तेंदू पत्ता तोड़ने वाले मजदूरों की मजदूरी न बढ़ने से उनमें भारी आक्रोश है। आईपीएफ/मजदूर किसान मंच ने सरकार से मनरेगा के समान मजदूरी, समय पर भुगतान और जंगलों में पानी-गुड़ की व्यवस्था करने की मांग की है।

 

वैश्विक संकट और महंगाई के बावजूद मजदूरों की मजदूरी स्थिर

वन निगम और ठेकेदारों के बीच अनुबंध में देरी से अभियान प्रभावित

50 पत्तियों के बजाय 90 पत्तियों की गड्डी बनवाकर शोषण का आरोप

चकिया सेक्शन की 6 इकाइयों और 22 फड़ों पर काम शुरू

चिलचिलाती धूप में काम करने वाले मजदूरों को नहीं मिल रहा पानी-गुड़

 देश और दुनिया जब वैश्विक आर्थिक संकट से जूझ रही है, तब गरीब मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट और गहरा गया है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद अंतर्गत चकिया के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले मजदूरों के लिए तेंदू पत्ता तोड़ाई रोजगार का एक मुख्य साधन रहा है। लेकिन इस वर्ष बढ़ती महंगाई के बावजूद इनकी मजदूरी में कोई इजाफा नहीं किया गया है। इसे लेकर एआईपीएफ/मजदूर किसान मंच के राज्य कार्य समिति सदस्य अजय राय ने सरकार और वन विभाग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

अनुबंध में देरी और अधूरी तैयारियां
हर साल 1 मई से शुरू होने वाला तेंदू पत्ता संग्रहण अभियान इस बार वन निगम और ठेकेदारों के बीच अनुबंध में देरी के कारण प्रभावित हुआ है। आमतौर पर अप्रैल के प्रथम पखवाड़े में ही अधिकारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और फड़ों (संग्रहण केंद्रों) का लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाता था। लेकिन इस बार विभागीय सक्रियता कम दिखाई दे रही है। अजय राय का कहना है कि यदि मनरेगा (अब वी बी जी राम जी) के तहत मजदूरों को समय पर रोजगार और भुगतान मिलता, तो उन्हें दर-दर नहीं भटकना पड़ता। देरी से शुरू हुए इस काम के कारण मजदूरों के पास अब काम के दिन कम बचे हैं।

मानक के नाम पर मजदूरों का आर्थिक शोषण
मजदूरों का सबसे बड़ा दर्द 'मानक' को लेकर है। नियमों के अनुसार, तेंदू पत्ते की एक गड्डी में 50 पत्तियां होनी चाहिए, लेकिन आरोप है कि ठेकेदार और विभाग मजदूरों से 80 से 90 पत्तियों की गड्डी बनवा रहे हैं। इतना ही नहीं, 100 गड्डियों पर 10 गड्डियां मुफ्त लेने की कुप्रथा भी जारी है। अजय राय ने बताया कि 2026 में 1500 से 2000 प्रति हजार गड्डी (मानक बोरा) का भाव तय है, लेकिन पत्तियों की संख्या बढ़ाकर मजदूरों का सीधा शोषण किया जा रहा है।

जंगलों में सुविधाओं का अभाव
भीषण गर्मी और लहकती धूप में मजदूर तड़के ही जंगलों की ओर निकल जाते हैं ताकि धूप तेज होने से पहले पत्तियां तोड़ सकें। सरकार की ओर से इन मजदूरों के लिए पीने का पानी, झोला और गुड़ देने का प्रावधान है, लेकिन धरातल पर यह सुविधाएं नदारद हैं। मजदूर अपने घरों पर पत्तियां सुखाने से लेकर बंडल बनाने तक का कठिन कार्य करते हैं, ताकि उन्हें उनकी मेहनत का उचित दाम मिल सके।

मजदूर किसान मंच की प्रमुख मांगें
अजय राय ने शासन-प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि महंगाई के अनुपात में मजदूरों की मजदूरी तुरंत बढ़ाई जानी चाहिए। तेंदू पत्ता तोड़ाई की मजदूरी का भुगतान तत्काल सुनिश्चित किया जाना चाहिए। काम के दौरान पानी की थैली, गुड़ और अन्य जरूरी सामान मुहैया कराया जाना चाहिए। गड्डियों में पत्तियों की संख्या मानक (50 पत्ती) के अनुसार ही रखी जानी चाहिए।

वर्तमान स्थिति और फड़ों का विवरण
विभाग के अनुसार, चकिया सेक्शन में कुल 6 इकाइयां गठित कर 22 फड़ों की स्थापना की गई है। इसमें छितमपुर इकाई के तहत ढोढनपुर और पोखरियाडीह, मुसाखाड़ इकाई में विजयपुरवा, पचफेड़िया में मुजफ्फरपुर और दुबेपुर, शिकारगंज इकाई में नेवाजगंज और पुरानाडीह, तथा लेहरा जमसोती इकाई और मुवारकपुर इकाई के तहत परना व भभौरा जैसे क्षेत्रों में फड़ खोले गए हैं। हालांकि लक्ष्य पिछले साल जैसा ही है, लेकिन मजदूरों की मांग है कि उन्हें 'आधुनिक गुलामी' से मुक्त कर सम्मानजनक मजदूरी दी जाए।

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