मसोई में शिव महापुराण की गूँज: "सनातन धर्म का संविधान है शिव महापुराण", शिवम शुक्ल महाराज ने बताए पुण्य के मार्ग
शहाबगंज के मसोई गांव में आयोजित सात दिवसीय शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ा। कथा व्यास शिवम शुक्ल महाराज ने बेलपत्र की महत्ता और दरिद्र सेवा को साक्षात शिव सेवा बताते हुए भक्ति की गंगा बहाई।
मसोई गांव में सात दिवसीय शिव महापुराण
कथा व्यास शिवम शुक्ल जी महाराज का प्रवचन
शिव महापुराण: सनातन धर्म का 'संविधान'
रोग मुक्ति के लिए बेलपत्र की दिव्य महिमा
अन्नदान और ब्राह्मण भोजन का विशेष महत्व
चंदौली जिले के शहाबगंज विकास खंड अंतर्गत मसोई गांव में आयोजित सात दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन श्रद्धा और भक्ति का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। कथा स्थल पर उमड़े जनसैलाब ने यह साबित कर दिया कि आज भी सनातन संस्कृति और शिव भक्ति के प्रति लोगों में अटूट विश्वास है। कथा व्यास पूज्य श्री शिवम शुक्ल जी महाराज ने अपनी ओजस्वी वाणी से ज्ञान और वैराग्य की अविरल धारा प्रवाहित की।

शिव महापुराण: जीवन जीने की नियमावली
श्रद्धालुओं को भावविभोर करते हुए महाराज श्री ने कहा कि शिव महापुराण मात्र एक कथा संग्रह नहीं, बल्कि यह 'सनातन धर्म का संविधान' है। यह ग्रंथ मनुष्य को लोक और परलोक सुधारने का मार्ग दिखाता है। उन्होंने सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि स्थान के अनुसार पुण्य का प्रभाव बदलता है। घर की तुलना में गौशाला, देवालय, तीर्थ और गंगा तट पर किया गया दान व तप कई गुना अधिक फलदायी होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ मन को सच्ची शांति मिले, वही स्थान परम पुण्यदायी है।
बेलपत्र और प्रकृति की महिमा
महाराज ने बेल वृक्ष (बिल्व) के आध्यात्मिक और औषधीय गुणों पर प्रकाश डालते हुए इसे भगवान शिव का साक्षात स्वरूप बताया। उन्होंने कहा कि बेलपत्र के मूल (जड़) में जल अर्पित कर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने से व्यक्ति असाध्य रोगों से मुक्ति पा सकता है। इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं के बीच प्रकृति के प्रति श्रद्धा और संरक्षण का संदेश दिया।
नर सेवा ही नारायण सेवा
अन्नदान की महत्ता पर विशेष जोर देते हुए शिवम शुक्ल महाराज ने कहा कि "भूखे को भोजन कराना ही सर्वोच्च पूजा है।" गृहस्थ जीवन में किसी जरूरतमंद की जठराग्नि को शांत करना साक्षात भगवान शिव को भोग लगाने के समान है। उन्होंने कामना पूर्ति के लिए ब्राह्मण भोजन की परंपरा और 'दशांग भोजन' के दस महत्वपूर्ण विधानों का विस्तार से वर्णन किया, जिससे श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए।
कथा के अंत में भव्य आरती का आयोजन किया गया, जिसमें मसोई और आसपास के गांवों के हजारों महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। पूरा वातावरण 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गुंजायमान रहा।
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