अजाखाना-ए-रज़ा में मुहर्रम की पहली मजलिस: शहीदों की याद में बहे आंसू, अंजुमनों ने पेश किया भावुक मातम
चंदौली के अजाखाना-ए-रज़ा में मुहर्रम की पहली मजलिस के साथ ही 10 दिवसीय शोक की शुरुआत हो गई। दिल्ली से आए मौलाना जाफ़र अली रिज़वी ने इमाम हुसैन की शहादत और उनके शांति संदेश पर रौशनी डाली।
मुहर्रम की पहली तारीख पर मजलिस
इमाम हुसैन पूरी इंसानियत के प्रतीक
जुल्म के खिलाफ शहादत का संदेश
बनारस की अंजुमन ने किया मातम
दस दिनों तक चलेगा मजलिसों का दौर
चंदौली जिला मुख्यालय के वार्ड नंबर 14 में स्थित स्वर्गीय डॉ. बबुआ के अजाखाना-ए-रज़ा में मुहर्रम की पहली तारीख़ पर गहरी आस्था, श्रद्धा और ग़म का माहौल देखने को मिला। मुहर्रम के चांद के साथ ही करबला के शहीदों की याद में अज़ादारों का दस दिवसीय शोक शुरू हो गया है। पहली मजलिस को संबोधित करने के लिए दिल्ली से मशहूर शिया धर्मगुरु मौलाना जाफ़र अली रिज़वी पहुंचे थे, जिन्होंने अपनी भावुक तकरीर से लोगों को मानवता की सीख दी।
इमाम हुसैन किसी एक धर्म के नहीं: मौलाना
मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना जाफ़र अली रिज़वी ने बेहद खूबसूरत शब्दों में कहा कि इमाम हुसैन किसी एक धर्म, जाति या समुदाय के दायरे में नहीं सिमटे हैं, बल्कि वे पूरी इंसानियत के रहनुमा (प्रतीक) हैं। उन्होंने अज़ादारों को समझाया कि मुहर्रम का पवित्र महीना केवल मातम और शोक मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा, परम त्याग और मानवता का सबसे बड़ा संदेश देने का जरिया है।
करबला था न्याय और अन्याय का बड़ा संघर्ष
मौलाना ने पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब और उनके प्यारे नवासे (नाती) इमाम हुसैन के अटूट रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि मोहम्मद साहब जानते थे कि उनका नवासा एक दिन इस्लाम और इंसानियत की हिफाजत के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देगा। उन्होंने कहा कि करबला की जंग केवल एक आम लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह न्याय और अन्याय के बीच का एक ऐतिहासिक और निर्णायक संघर्ष था। इमाम हुसैन ने जुल्म और तानाशाही के सामने झुकना मंजूर नहीं किया और अपने 72 साथियों के साथ शहादत देकर दुनिया को सच्चाई की राह पर चलना सिखाया।
नौहाख्वानी और मातम से नम हुईं आँखें
मजलिस के समापन के बाद अंजुमन गुलज़ार-ए-पंजतनी और बनारस से आई अंजुमन हुसैनिया के नौहाख्वानों ने दर्दभरे नौहे पढ़े, जिस पर उपस्थित अज़ादारों ने सीनाज़नी (मातम) कर करबला के भूखे-प्यासे शहीदों को याद किया। इस दौरान सोज़ख़्वानी मायल चंदौलवी ने की, जबकि शहंशाह मिर्जापुरी और शाहिद बनारसी ने पेशख्वानी की।
सैम हॉस्पिटल के संचालक डॉ. एस.जी. इमाम ने कार्यक्रम की रूपरेखा बताते हुए कहा कि अजाखाने में मजलिसों और अज़ादारी का यह सिलसिला लगातार दस दिनों (आशूरा) तक चलता रहेगा। इस पहली मजलिस के मौके पर भारी संख्या में महिला, पुरुष और स्थानीय अज़ादार मौजूद रहे।
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