अधिमास से साल 2026 में होगा 2 महीने का जेठ का महीना, ऐसी है ज्योतिष की गणना
विक्रम संवत 2083 में विशेष बदलाव
अधिमास से जेठ होगा दो माह का
हर तीसरे वर्ष आता है अधिमास
32 माह 16 दिन बाद बनता है अधिमास
हिंदू पंचांग में वर्ष 2026 (विक्रम संवत 2083) विशेष होगा क्योंकि इसमें हिंदी महीना जेठ दो माह का पड़ेगा। इसका कारण अधिमास है, जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। भारतीय काल गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार अधिमास आता है। धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण होता है और इस दौरान श्रद्धालु पूजा-पाठ, व्रत, जप, तप तथा योग-साधना में विशेष रूप से संलग्न रहते हैं।
सौर और चांद्र वर्ष का संतुलन
भारतीय पंचांग सौर और चांद्र गणना पर आधारित है। श्रीकाशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री एवं बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय बताते हैं कि सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब छह घंटे का होता है, जबकि चांद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों में प्रतिवर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर उत्पन्न हो जाता है। यही अंतर हर तीन वर्ष में एक मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त माह जोड़ा जाता है, जिसे अधिमास कहा जाता है।
अधिमास कब और कैसे आता है
अधिमास हर 32 माह, 16 दिन और चार घटी के अंतराल पर आता है। इसकी स्थिति हमेशा पीछे खिसकती है और यह 32 से 36 दिन के बीच का अंतराल बनाता है। पिछली बार 2023 में सावन का महीना दो बार पड़ा था। अब 2026 में जेठ दो माह का होगा। यह घटना तब घटती है जब दो अमावस्याओं के बीच कोई सूर्य संक्रांति नहीं पड़ती।
महीनों का नामकरण
हिंदू काल गणना पद्धति के अनुसार वर्ष का व्यवहार सौर गणना से, मास का व्यवहार चांद्र गणना से और दिन का व्यवहार सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक की अवधि से होता है। प्रत्येक माह का नाम दो अमावस्याओं के बीच पड़ने वाली सूर्य संक्रांति से तय होता है। जैसे, दो अमावस्याओं के बीच मेष संक्रांति पड़ने पर चैत्र, वृष संक्रांति पड़ने पर वैशाख और इसी क्रम से अन्य माह। किंतु जब किसी दो अमावस्याओं के बीच कोई सूर्य संक्रांति नहीं होती, तो उस मास को नाम नहीं मिल पाता और लोक व्यवहार में उसे अधिमास कहा जाता है।
धार्मिक दृष्टि से महत्व
अधिमास को हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यकारी और फलदायी माना गया है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस महीने में किया गया दान, व्रत, उपवास और भक्ति साधारण समय की तुलना में कई गुना अधिक फल देता है। यही कारण है कि भक्तजन इस अवधि में विशेष रूप से पूजा-पाठ, जप, तप और व्रत का पालन करते हैं।
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