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चंद्र ग्रहण विशेष : राहु-केतु का प्रभाव और ग्रहण काल का रहस्य: अशुभ साये से बचने के लिए क्या कहता है शास्त्र ?

सूर्य और चंद्र ग्रहण केवल खगोलीय घटनाएँ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक 'देवासुर संग्राम' की वेला हैं। इस समय जल गंगा के समान पवित्र और मंत्र जप अक्षय फलदायी हो जाता है। जानिए ग्रहण काल में स्नान, दान और मंत्र सिद्धि का संपूर्ण विधान और वैज्ञानिक महत्व।

 
 

अमृत वेला में मंत्र दीक्षा का विशेष महत्व

ग्रहण काल में समस्त जल गंगा के समान पवित्र

राहु-केतु के छाया प्रभाव से सुरक्षा के उपाय

नाभि मात्र जल में खड़े होकर मंत्र पुरश्चरण

ज्योतिष शास्त्र और वेदों में ग्रहण की घटना को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। आगामी मंगलवार की शाम होने वाला ग्रहण न केवल खगोलीय दृष्टि से, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी एक स्वर्णिम अवसर है। शास्त्रों के अनुसार, राहु और केतु 'छाया ग्रह' हैं। पृथ्वी और चंद्रमा के मार्ग के कटान बिंदुओं पर अत्यधिक अंधकार (तमाधिक्य) होने के कारण इन्हें 'तमोग्रह' यानी राहु-केतु कहा जाता है।

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अमृत पान से प्राप्त देव पद और राहु-केतु का दर्शन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राहु और केतु ने अमृत पान किया था, जिसके कारण उन्हें देव पद प्राप्त हुआ। इन छाया ग्रहों में सौरमंडल के सातों ग्रहों के गुण विद्यमान होते हैं। सामान्यतः ये दिखाई नहीं देते, लेकिन ग्रहण काल के दौरान ये सूर्य या चंद्रमा के बिम्ब पर छाया के रूप में प्रकट होते हैं। 'संवत्सर प्रदीप' के अनुसार, राहु का चक्षु दर्शन ही ग्रहण कहलाता है।

ग्रहण काल में स्नान का वैज्ञानिक और धार्मिक आधार
व्यास स्मृति के अनुसार, ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा की किरणों के प्रभाव से पृथ्वी का समस्त जल अत्यंत पवित्र हो जाता है। इस समय किया गया स्नान रोगों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।

रोगी के लिए नियम: जो व्यक्ति बीमार है, उसे अपनी प्रकृति के अनुसार गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए।

गंगा तुल्य जल: शास्त्रों का उद्घोष है कि ग्रहण के समय हर जलाशय का जल गंगा के समान और हर ब्राह्मण वेदव्यास जी के समान पूज्य हो जाता है।

“सर्वं भूमिसमं दानं सर्वे व्याससमा द्विजाः । सर्वं गङ्गासमं तोयं ग्रहणे नात्र संशयः”

मंत्र दीक्षा और पुरश्चरण: सिद्धियों का द्वार
ग्रहण काल को 'अमृत वेला' कहा गया है। 'सारसंग्रह' के अनुसार, इस समय मंत्र दीक्षा लेने के लिए किसी विशेष तिथि या काल की शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं होती। यह समय स्वयं सिद्ध है।

पुरश्चरण विधि: यदि कोई साधक ग्रहण के आरंभ से समाप्ति तक निरंतर एक ही मंत्र का जप करता है, तो उसे 'पुरश्चरण' का फल प्राप्त होता है।

संकल्प: साधक को "अमुक शर्माहं, अमुक देवता कृपा प्रसाद सिद्धि हेतवे... (मंत्र) अस्य मंत्रस्य ग्रहणकालिक पुरश्चरणं अहं करिष्ये" कहकर संकल्प लेना चाहिए।

जप की विधि: किसी पवित्र नदी (विशेषकर समुद्रगामिनी नदी) में नाभि तक जल में खड़े होकर जप करना श्रेष्ठ है। यदि तट पर बैठे हैं तो आसन और माला का प्रयोग करें, लेकिन जल के भीतर इनकी आवश्यकता नहीं होती।

ग्रहण का त्याग करने पर दोष: क्यों जरूरी है स्नान?
'वृहद्वसिष्ठ' के अनुसार, जो व्यक्ति ग्रहण के समय आलस्यवश स्नान नहीं करता, वह सात जन्मों तक रोगों और दुखों का भागी होता है। विशेष बात यह है कि यदि घर में सूतक या पातक (जन्म-मरण का आशौच) लगा हो, तब भी ग्रहण स्नान अनिवार्य है। 'स्मृति' कहती है कि राहु के दर्शन होने पर सूतक का दोष नहीं लगता, केवल स्नान मात्र से शुद्धि हो जाती है।

आध्यात्मिक देवासुर संग्राम और आसुरी शक्तियाँ
वेदों में भी ग्रहण का विस्तृत वर्णन मिलता है। 'माध्यन्दिनी श्रुति' कहती है कि जब राहु सूर्य और चंद्रमा को अपनी छाया से ढकता है, तो उस भूखंड पर आसुरी शक्तियाँ बलवान हो जाती हैं। यह एक प्रकार का 'आध्यात्मिक देवासुर संग्राम' है।

ईश्वर का भजन और मंत्र जप इस नकारात्मक छाया का प्रतिकार करते हैं। जो व्यक्ति इस समय ध्यान और कीर्तन करता है, उसे स्थानीय देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसका कल्याण होता है। वहीं, भजन न करने वालों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

साधकों के लिए विशेष निर्देश
आगामी मंगलवार की शाम ग्रहण के मोक्ष तक सभी को संयम का पालन करना चाहिए। ग्रहण के बाद अगले दिन सूर्योदय पर हवन, ब्राह्मण भोज और गुरु दक्षिणा देने से देवता प्रसन्न होकर साधक को मंत्र सिद्धि प्रदान करते हैं। दान का फल इस समय स्वर्ण और भूमि दान के समान अक्षय होता है।

अतः इस पावन काल का लाभ उठाएं, पवित्र नदियों में स्नान करें और अपने इष्ट देव के मंत्रों का जप कर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय करें।

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