जिले का पहला ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टलChandauliSamachar_Logo

पितरों को मुक्ति दिलाएगी इंदिरा एकादशी 2025 : जानें व्रत का महत्व, पूजा विधि और पारण का समय

पारण का शुभ मुहूर्त: 18 सितंबर को 2025 को सुबह 6 बजकर 7 मिनट के बाद कभी भी किया जा सकता है। 
 

इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व

भगवान विष्णु की पूजा करने से मिलता है पितरों को मोक्ष

मिलती है जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति 

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। सभी एकादशियों में पितृ पक्ष के दौरान आने वाली इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व है। इस वर्ष, यह एकादशी 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। यह व्रत पितृ ऋण से मुक्ति का भी एक उत्तम मार्ग माना जाता है।

इंदिरा एकादशी का महत्व
गरुड़ पुराण के अनुसार, इंदिरा एकादशी का व्रत पितृ पक्ष में श्राद्ध के समान ही फलदायी होता है। इस दिन व्रत रखने वाला व्यक्ति न केवल अपने पापों से मुक्ति पाता है, बल्कि उसके पूर्वजों को भी नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में महिष्मती नगरी के राजा इंद्रसेन ने नारद मुनि के कहने पर इस व्रत को रखा था, जिससे उनके पिता को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। यह व्रत पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का एक शक्तिशाली तरीका है। जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर पाते, उनके लिए यह व्रत एक आसान और प्रभावी उपाय है।

शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
इंदिरा एकादशी का व्रत दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है। दशमी के दिन एक बार भोजन करना चाहिए, जिसमें लहसुन-प्याज का सेवन न हो। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का ध्यान करें।

इंदिरा एकादशी में पूजा सामग्री:

भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर

तुलसी के पत्ते

पीले फूल और फल

धूप, दीप और अगरबत्ती

चंदन और रोली

पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल)

नैवेद्य

इंदिरा एकादशी की पूजा विधि:

सबसे पहले भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें और उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं।

इसके बाद उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं और रोली-चंदन का तिलक लगाएं।

भगवान को पीले फूल और तुलसी के पत्ते अर्पित करें।

धूप-दीप जलाकर आरती करें।

पंचामृत और नैवेद्य अर्पित करें।

इस दिन पितरों का ध्यान करते हुए उनका श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए। एक थाली में भोजन निकालकर गाय को खिलाना बेहद शुभ माना जाता है।

पूरे दिन निराहार रहकर व्रत रखें और 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। शाम को भगवान विष्णु और तुलसी की पूजा करें।

एकादशी व्रत में अन्न और जल का त्याग किया जाता है। अगले दिन, यानी द्वादशी को व्रत का पारण किया जाता है।

इंदिरा एकादशी व्रत का पारण
द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद व्रत का पारण किया जाता है। पारण के समय ध्यान रखना चाहिए कि द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले ही भोजन कर लें। पारण के लिए सात्विक भोजन ही ग्रहण करें, जैसे कि चावल, दाल और सब्जियां। व्रत पारण के बाद गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान-दक्षिणा देना बेहद शुभ माना जाता है।

पारण का शुभ मुहूर्त: 18 सितंबर को 2025 को सुबह 6 बजकर 7 मिनट के बाद कभी भी किया जा सकता है। 

इंदिरा एकादशी का व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमें संयम, त्याग और पूर्वजों के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है। इस दिन व्रत रखकर हम अपने पितरों को मोक्ष दिला सकते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

Tags

चंदौली जिले की खबरों को सबसे पहले पढ़ने और जानने के लिए चंदौली समाचार के टेलीग्राम से जुड़े।*