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अश्वत्थामा के अक्षम्य अपराध को कैसे श्रीकृष्ण ने सुधारा, जानें जिउतिया व्रत से जुड़ी एक और पौराणिक कथा

आश्विन मास की अष्टमी तिथि पर माताओं ने अपनी संतान की लंबी उम्र, सुरक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के लिए 24 घंटे का कठिन निर्जला जिउतिया व्रत रखा। महापर्व छठ की तरह तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत का पारण नवमी तिथि को किया जाएगा।

 
 

संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास

महापर्व छठ की तरह नहाय-खाय से शुरुआत

आश्विन मास की अष्टमी को जितिया व्रत

24 घंटे तक माताओं का कठिन उपवास

भगवान श्रीकृष्ण और उत्तरा की पौराणिक कथा

वंश वृद्धि और संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने जिउतिया का निर्जला उपवास रखा है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की सुरक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए 24 घंटे तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए कठिन व्रत रखती हैं। महापर्व छठ की तरह ही यह व्रत भी पूरे तीन दिनों तक विधि-विधान के साथ मनाया जाता है।

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सप्तमी से नवमी तक के नियम
व्रत रखने वाली महिलाओं के अनुसार, यह निर्जला उपवास आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। पर्व की शुरुआत सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के साथ होती है। इसके बाद अष्टमी को 24 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है और फिर नवमी तिथि के दिन सुबह विधि-पूर्वक पूजा-अर्चना के बाद व्रत का पारण किया जाता है।

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अश्वत्थामा ने किया था ऐसा अपराध 
इस पावन व्रत का संबंध महाभारत काल से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अपने पिता की मृत्यु से क्रोधित होकर अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में घुसकर द्रौपदी की पांचों सोती हुई संतानों को पांडव समझकर मार डाला था। इस घोर अपराध के बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली। बदले की आग में जल रहे अश्वत्थामा ने इसके बाद अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में ही नष्ट कर दिया।

श्रीकृष्ण ने दिया संतान को नया जीवन
पांडव वंश की रक्षा के लिए उत्तरा की संतान का जन्म लेना अत्यंत आवश्यक था। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को समर्पित कर दिया और उसे गर्भ में ही पुनः जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर दोबारा जीवन प्राप्त करने के कारण उस बालक का नाम "जीवित्पुत्रिका" पड़ा, जो आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुए। तभी से माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं।

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