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नागपंचमी विशेष : राक्षस दारुक के आतंक से शिवभक्त सुप्रिय की रक्षा, ऐसे प्रकट हुए गुजरात के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

गुजरात के द्वारका में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक 'श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग' की महिमा बेहद अद्भुत है। जानिए कैसे शिवभक्त सुप्रिय की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। पूरी कथा पढ़ें!

 
 

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नागेश्वर धाम का महत्व

गुजरात के द्वारका स्थित पावन ज्योतिर्लिंग

शिवभक्त सुप्रिय और राक्षस दारुक की कथा

भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग रूप में प्राकट्य

नागेश्वर धाम दर्शन और कथा सुनने का फल

भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का विशेष स्थान है। यह प्रसिद्ध मंदिर गुजरात राज्य में द्वारका पुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर बाहरी क्षेत्र में स्थित है। हिंदू धर्म में 'नागेश्वर' का अर्थ 'नागों के ईश्वर' होता है, जो विष और भय से रक्षा का प्रतीक है। रुद्र संहिता में इस पावन स्थान को 'दारुकावने नागेशं' कहा गया है।

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कथा सुनने और दर्शन का मिलता है बड़ा फल

शास्त्रों में नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और इसकी उत्पत्ति की कथा सुनने का बहुत बड़ा माहात्म्य बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इसकी कथा सुनता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वह जीवन में सभी सांसारिक सुखों का भोग करता है और अंत में उसे भगवान शिव के परम धाम की प्राप्ति होती है।

शिवभक्त सुप्रिय और दारुक राक्षस का प्रसंग

पौराणिक कथा के अनुसार, सुप्रिय नाम का एक बहुत ही धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था, जो भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वह हर समय शिवजी की पूजा और ध्यान में लीन रहता था। लेकिन दारुक नाम का एक दुष्ट राक्षस उसकी इस भक्ति से बहुत चिढ़ता था और हमेशा उसकी पूजा में रुकावट डालने की कोशिश करता रहता था।

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कारागार में भी नहीं रुकी शिव भक्ति

एक बार सुप्रिय नाव में सवार होकर कहीं जा रहा था, तभी राक्षस दारुक ने मौका देखकर नाव पर हमला कर दिया। उसने सुप्रिय समेत सभी यात्रियों को बंदी बनाकर अपनी राजधानी की जेल में डाल दिया। इसके बावजूद सुप्रिय घबराया नहीं और जेल के अंदर भी भगवान शिव की आराधना करता रहा। उसने वहां बंद अन्य लोगों को भी शिव भक्ति की प्रेरणा दी।

जब ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए महादेव

जब दारुक को यह बात पता चली, तो वह गुस्से में जेल पहुंचा। उसने ध्यान में बैठे सुप्रिय को बहुत डराया-धमकाया और अपने सेवकों को सुप्रिय और अन्य सभी बंदियों को मार डालने का हुक्म दे दिया। लेकिन सुप्रिय बिना डरे अपनी और दूसरों की रक्षा के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगा।

सुप्रिय की पुकार सुनते ही भगवान शिव जेल में एक चमकीले सिंहासन पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए। महादेव ने सुप्रिय को अपना पाशुपत-अस्त्र प्रदान किया, जिससे सुप्रिय ने राक्षस दारुक और उसके साथियों का अंत कर दिया। इसके बाद भगवान शिव के निर्देश पर इस ज्योतिर्लिंग का नाम 'नागेश्वर' पड़ा।

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