शनिश्चरी अमावस्या पर पितरों और शनि देव की पूजा का है विशेष महत्व
मिलती है पितरों की शांति और शनि देव की कृपा
भादो की अमावस्या 23 अगस्त को
जरूर करें पितरों का तर्पण, शनि देव की पूजा
इस बार भादो की अमावस्या शनिवार, 23 अगस्त को पड़ रही है, जिसके कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या के रूप में जाना जाता है। दृक पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि सुबह 11 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। इस दिन पितरों का तर्पण, शनि देव की पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे जीवन के कई कष्टों से मुक्ति मिलती है।
मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। चूंकि यह दिन शनिवार को पड़ रहा है, इसलिए इस दिन शनि देव की पूजा का भी विशेष महत्व है। शनि अमावस्या पर सच्ची श्रद्धा से शनि देव की पूजा करने और पवित्र नदी में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है।
इस दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए कुछ विशेष उपाय किए जा सकते हैं:--
दीपक जलाएं और भोग लगाएं: सुबह स्नान करने के बाद पितरों की तस्वीर के सामने दीपक जलाएं और उन्हें भोग अर्पित करें। ऐसा माना जाता है कि इससे पितृ प्रसन्न होते हैं और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है।
पीपल की पूजा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीपल के पेड़ में पितरों का वास होता है। इसलिए, शनि अमावस्या पर पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाकर उसकी परिक्रमा करना पितृ दोष से छुटकारा दिलाता है और आर्थिक तंगी को दूर करता है।
मुख्य द्वार पर दीपक: घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है और घर में सकारात्मकता का संचार होता है।
इष्टि अनुष्ठान और कालसर्प दोष निवारण
अमावस्या का दिन इष्टि अनुष्ठान और कालसर्प दोष निवारण की पूजा के लिए भी उपयुक्त होता है।
इष्टि अनुष्ठान: यह एक ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है, जो भक्त अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हवन की तरह आयोजित करते हैं। यह विशेष रूप से शनि अमावस्या पर करना बहुत फलदायी माना जाता है।
कालसर्प दोष निवारण: जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, उनके लिए अमावस्या का दिन इस दोष को दूर करने के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने का सबसे अच्छा समय माना जाता है।
राहुकाल और अन्य महत्वपूर्ण बातें
शनिश्चरी अमावस्या के दिन किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले राहुकाल का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिन राहुकाल सुबह 9 बजकर 9 मिनट से 10 बजकर 46 मिनट तक रहेगा, जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता।
इस दिन पवित्र नदी में स्नान करना बहुत शुभ माना जाता है। हालांकि, इस मौके पर कोई भी नया काम शुरू नहीं करना चाहिए। इस दिन का मुख्य उद्देश्य पूजा-पाठ, दान-पुण्य और पितरों को याद करना है। यह दिन न केवल शनि देव और पितरों को समर्पित है, बल्कि यह आत्मिक शुद्धि और शांति का भी प्रतीक है।
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