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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुवंश राम जी का हुआ निधन
चंदौली जिले में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमोघपुर गांव निवासी रघुवंश राम का गुरुवार को निधन हो गया। उन्होंने सुबह छह बजकर 32 मिनट पर अंतिम सांस ली।
 
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुवंश राम जी का निधन
 


चंदौली जिले में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमोघपुर गांव निवासी रघुवंश राम का गुरुवार को निधन हो गया। उन्होंने सुबह छह बजकर 32 मिनट पर अंतिम सांस ली। राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। रेलवे की सेवा के बाद उन्होंने पंडित दीनदयाल मंडल के इलेक्ट्रिकल विभाग से अवकाश ग्रहण किया था।

बताते चलें कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुवंश राम मूलरूप से बिहार के औरंगाबाद, अंकोढ़ा गांव के निवासी थे। वर्ष 1954 से ही वे परिजनों के साथ नियामताबाद विकास खंड के अमोघपुर गांव में मकान बनाकर परिवार के साथ रहते थे। पत्नी नैपूरी देवी का पांच दिसंबर 1979 में निधन हो गया था। 58 साल की उम्र में रघुवंश राम 31 मार्च 1998 को सेवानिवृत्त हो गए। क्षेत्र के विकास के लिए सक्रिय रहते हुए समस्याओं के प्रति समाज में सबसे आगे थे। उनके निधन ने हर किसी की आंखें नम कर दी। 

सूचना मिलते ही एसडीएम, अलीनगर थाना प्रभारी, लेखपाल जयप्रकाश व विपिन पहुंचे गए। उपजिलाधिकारी और अलीनगर थाना प्रभारी ने सलामी दी। गार्ड आफर ऑनर देकर अंतिम संस्कार किया गया। उनके परिवार में बेटे लाल मोहन कुमार, विजय कुमार, संजय शर्मा व अजय कुमार अकेला और एक बेटी अंजना हैं।


रेलकर्मी हूं, नहीं चाहिए पेंशन


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को सरकार की तरफ से पेंशन दिया जाता है। जब स्वतंत्रता सेनानी रघुवंश राम को पेंशन के लिए आवेदन मांगा गया तो उन्होंने सरकार को एक लेटर लिखा। जिस पर उन्होंने लिखा था कि मैं रेलकर्मी हूं, पेंशन नहीं चाहिए। इस सोच की हर किसी ने तारीफ की।


उड़ा दिया था रेलवे पुल


अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भाग लेकर उनसे लोहा लेते रहे। उन्होंने अंग्रेजों की तमाम यातनाएं भी सही। अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उन्होंने औरंगाबाद में रेलवे पुल को बम से उड़ा दिया था। गांधी जी के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था।


गया से पीडीडीयू नगर तक पदयात्रा


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुवंश ने एक से बढ़कर एक कारनामे किए। उनके आगे तो अंग्रेजों की एक नहीं चलती थी। वे जहां से गुजरते थे, काफिला उनके पीछे हमेशा रहता था। एक बार तो उन्होंने गया से मुगलसराय (अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर) तक पदयात्रा की थी।