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स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व विधायक गंजी प्रसाद की प्रतिमा का 11 लीटर दूध से दुग्धाभिषेक, 29वीं पुण्यतिथि की तैयारियां पूरी

महान स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व विधायक स्वर्गीय गंजी प्रसाद की 29वीं पुण्यतिथि सोमवार को चंदौली में धूमधाम से मनाई जा रही है। श्रद्धांजलि सभा से पहले उनकी प्रतिमा का 11 लीटर दूध से दुग्धाभिषेक किया गया। जानिए उनके संघर्षों और बेतों की सजा की पूरी कहानी।

 
 

स्वतंत्रता सेनानी गंजी प्रसाद की पुण्यतिथि

चकिया तिराहे पर भव्य दुग्धाभिषेक हुआ

अंग्रेजी हुकूमत ने दी थी कठोर सजा

तीन बार चुने गए थे विधायक

मुलायम सरकार को दिया था समर्थन

चंदौली जिले के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पूर्व विधायक स्वर्गीय गंजी प्रसाद की 29वीं पुण्यतिथि सोमवार को पूरे श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाएगी। इस पुण्यतिथि समारोह को लेकर चकिया तिराहे पर स्थित उनकी भव्य प्रतिमा स्थल पर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इस दौरान क्षेत्र के कई दिग्गज नेता शामिल होंगे।

समारोह के भव्य कार्यक्रम के तहत सुबह से ही विशेष हवन-पूजन, माल्यार्पण एवं एक विशाल श्रद्धांजलि सभा का भव्य आयोजन किया जाएगा। इस गरिमामयी कार्यक्रम में क्षेत्र के तमाम सम्मानित जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बहुत बड़ी संख्या में उनके समर्थक शामिल होकर अपनी श्रद्धांजलि देंगे।

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वैदिक मंत्रोच्चार के साथ होगा हवन-पूजन
पूर्व ब्लॉक प्रमुख बाबूलाल यादव ने इस संबंध में विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि सोमवार की सुबह प्रतिमा स्थल पर सबसे पहले वैदिक मंत्रोच्चार होगा। इसके साथ ही विद्वान आचार्यों के सानिध्य में एक विशेष हवन-पूजन का आयोजन किया जाएगा। इसके उपरांत स्वर्गीय गंजी प्रसाद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए जाएंगे। माल्यार्पण के पश्चात आयोजित श्रद्धांजलि सभा में क्षेत्र के वरिष्ठ नेताओं द्वारा स्वर्गीय गंजी प्रसाद के गौरवशाली व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा।

11 लीटर दूध से हुआ प्रतिमा का दुग्धाभिषेक
इस पावन पुण्यतिथि समारोह की पूर्व तैयारी के सिलसिले में रविवार को उनके पौत्र एवं जिला पंचायत सदस्य मुलायम सिंह यादव ने चकिया तिराहे पर एक विशेष कार्यक्रम किया। मुलायम सिंह यादव ने समर्थकों संग तिराहे पर स्थित स्वर्गीय गंजी प्रसाद की प्रतिमा का 11 लीटर शुद्ध दूध से वैदिक रीति से दुग्धाभिषेक कराया।

इसके साथ ही प्रशासन और समर्थकों की मदद से प्रतिमा स्थल की विशेष रूप से साफ-सफाई कराई गई। पूरे परिसर को आकर्षक झालरों और सजावटी सामग्री से सजाया गया। रविवार की शाम होते-होते तक पूरा प्रतिमा स्थल श्रद्धा, आदर और सम्मान के एक अलौकिक माहौल से पूरी तरह से सराबोर दिखाई देने लगा था।

अंग्रेजी हुकूमत की कठोर सजा और 15 बेंत
इस विशेष अवसर पर पूर्व सांसद रामकिशुन यादव ने स्वर्गीय गंजी प्रसाद के ऐतिहासिक संघर्षों को याद किया। उन्होंने बताया कि उनका जीवन संघर्षों की एक अद्भुत मिसाल रहा है। पूर्व सांसद ने बताया कि वर्ष 1942 के ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय और उग्र भागीदारी के कारण उन्हें क्रूर अंग्रेजी हुकूमत के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा था।

इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास के साथ-साथ 15 बेतों की रोंगटे खड़े कर देने वाली अत्यंत अमानवीय सजा भुगतनी पड़ी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उन्होंने अपने पैर पीछे नहीं खींचे और जनसेवा को अपना मुख्य लक्ष्य बनाए रखा। उन्होंने समाज के दबे-कुचले और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए लगातार कार्य किया।

मुगलसराय से तीन बार विधायक निर्वाचित हुए
पूर्व सांसद ने बताया कि वर्ष 1948 में स्वर्गीय गंजी प्रसाद को जिला बोर्ड वाराणसी के सदस्य के रूप में पहली बार निर्वाचित किया गया था। 
इसके बाद वर्ष 1962 में उनकी लोकप्रियता के कारण वे नियामताबाद के ब्लॉक प्रमुख चुने गए। राजनीतिक जीवन में उनकी ईमानदारी के चलते लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही। 

इसके बाद वर्ष 1973-1974 में वे मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। विधायक बनकर उन्होंने क्षेत्र के चौमुखी विकास को एक नई और बेहतरीन दिशा दी। क्षेत्र की जनता ने वर्ष 1977 में भी उन पर दोबारा अटूट विश्वास जताया और उन्हें पुनः भारी मतों से जिताकर उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भेजा।

मुलायम सरकार को समर्थन और सादगी भरा जीवन
पूर्व सांसद रामकिशुन यादव ने आगे बताया कि वर्ष 1989 में राजनीतिक समीकरण बदले, लेकिन स्वर्गीय गंजी प्रसाद ने एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उस कठिन दौर में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली नवगठित सरकार को अपना बिना शर्त समर्थन देकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक वे बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे। अपने जनसरोकारों और जुझारू संघर्षशील व्यक्तित्व के कारण वे आज भी चंदौली की जनता के दिलों में अमर हैं।

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