ताराजीवनपुर में 50 साल पुरानी मेघा बाबा की समाधि अब नवनिर्मित मंदिर में स्थापित, उमड़े 18 गांवों के श्रद्धालु
चंदौली के ताराजीवनपुर स्थित पचफेड़वा गांव में शनिवार को महान संत मेघा बाबा की लगभग 50 वर्ष पुरानी समाधि को नवनिर्मित मंदिर में विधि-विधान से स्थापित किया गया। इस ऐतिहासिक और धार्मिक पल के गवाह बने 18 गांवों के हजारों श्रद्धालु। पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें।
नवनिर्मित मंदिर में स्थापित हुई मेघा बाबा की समाधि
ताराजीवनपुर के पचफेड़वा गांव में धार्मिक अनुष्ठान
उद्घाटन समारोह में पहुंचे 18 गांवों के श्रद्धालु
हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की गहरी आस्था
आठ दशक पूर्व पचफेड़वा में रहते थे महान संत
चंदौली जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत ताराजीवनपुर से आस्था की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। यहाँ पचफेड़वा गांव के समीप नेशनल हाईवे के किनारे स्थित लगभग 50 वर्ष पुरानी महान संत मेघा बाबा की समाधि को शनिवार को पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ नवनिर्मित मंदिर में स्थापित किया गया। पूजा-पाठ के बाद इस नए भव्य मंदिर का भव्य उद्घाटन भी किया गया।
18 गांवों के श्रद्धालुओं ने टेका मत्था
इस पावन और ऐतिहासिक धार्मिक उत्सव के अवसर पर अलीनगर और ताराजीवनपुर क्षेत्र के करीब 18 गांवों के श्रद्धालु भारी संख्या में उपस्थित रहे। चारों तरफ बाबा के जयकारों से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। मंदिर के पुजारी हरिद्वार यादव ने इस मौके पर बाबा के जीवन से जुड़ी कई पुरानी और रोचक बातें बताईं, जिसे सुनकर नई पीढ़ी के लोग काफी प्रभावित हुए।
हंडिया से भोजन करने वाले महान संत की महिमा
पुजारी हरिद्वार यादव ने बताया कि आज से करीब आठ दशक (80 वर्ष) पहले पचफेड़वा गांव में महान संत मेघा बाबा रहा करते थे। उनके बारे में यह लोक मान्यता है कि वे पूरे क्षेत्र में किसी भी एक परिवार से भोजन मांगकर लाते थे और उसे अपनी मिट्टी की हंडिया में रख देते थे। इसके बाद उसी एक हंडिया के भोजन में से वे स्वयं भी खाते थे और प्रेमपूर्वक कुत्तों को भी खिलाया करते थे।
पांच दशक पहले हुआ था बाबा का महाप्रयाण
लगभग पांच दशक पूर्व जब संत मेघा बाबा की मृत्यु हुई, तो उनकी पवित्रता और चमत्कारों से प्रभावित होकर ग्रामीणों ने नेशनल हाईवे के किनारे ही उनकी समाधि बना दी थी। ग्रामीणों ने इसके बाद कई बार यहाँ एक पक्का और बड़ा मंदिर बनाने का प्रयास किया, लेकिन कई कोशिशों के बाद भी किन्हीं कारणों से मंदिर का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पा रहा था।
हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए आस्था का केंद्र
इसके बाद करीब 20 साल पहले संतोष सिपाही, डॉ. स्वामीनाथ और तत्कालीन जिला पंचायत सदस्य अंबिका यादव के सामूहिक प्रयासों से इस पवित्र समाधि के ऊपर मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कराया गया। तब से लेकर आज तक हर साल यहाँ भव्य भंडारे और धार्मिक मेलों का आयोजन बड़ी धूमधाम से होता आ रहा है।
इस समाधि और मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोगों की बेहद गहरी आस्था जुड़ी हुई है। दोनों धर्मों के लोग यहाँ मन्नतें मांगने आते हैं। शनिवार को हुए इस भव्य उद्घाटन कार्यक्रम के अवसर पर डॉ. स्वामीनाथ, केदार यादव, विक्की प्रधान, संतोष यादव सहित भारी संख्या में क्षेत्रीय गणमान्य लोग और श्रद्धालु मुख्य रूप से मौजूद रहे।
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