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'वनाधिकार दो या ग्राम सभा की जमीन पर बसाओ': सांसद छोटेलाल खरवार ने भरदुआ विवाद का दिया बड़ा फॉर्मूला

चंदौली के भरदुआ में बुलडोजर कार्रवाई के बाद विवाद गरमा गया है। वन विभाग भूमि कब्जामुक्त कराने पर अड़ा है, वहीं सांसद छोटेलाल खरवार ने पात्रों को वनाधिकार देने या ग्राम सभा की जमीन पर पट्टा देकर बसाने का फॉर्मूला दिया है।

 
 

भरदुआ में बुलडोजर थमा विवाद गरमाया

सांसद छोटेलाल खरवार का पुनर्वास फॉर्मूला

53 साल पुराना विस्थापन का पेच

वन भूमि पर अवैध कब्जे पर सख्त डीएफओ

वास्तविक विस्थापितों के अधिकार की मांग

चंदौली जनपद के भरदुआ में प्रशासन का बुलडोजर भले ही रुक गया है, लेकिन इसके बाद शुरू हुई राजनीति ने माहौल को और गर्म कर दिया है। चंदौली समाचार की खास ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, एक तरफ वन विभाग अपनी जमीन को कब्जामुक्त कराने पर अड़ा हुआ है, तो वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दल नेताओं की आवाजाही के साथ मैदान में उतर आए हैं। हालांकि इस शोर-शराबे के बीच मुख्य सवाल यह है कि वास्तविक विस्थापित कौन है और वन भूमि पर अवैध कब्जेदार कौन?

सांसद छोटेलाल खरवार का स्थायी समाधान फॉर्मूला
मामले में क्षेत्रीय सांसद छोटेलाल खरवार का रुख बेहद स्पष्ट है। उनका कहना है कि जो गरीब वनाधिकार के पात्र हैं, उन्हें कानूनन उनका अधिकार दिया जाए और जो पात्र नहीं हैं, उन्हें ग्राम सभा की जमीन पर पट्टा देकर एक जगह स्थायी रूप से बसाया जाए। सांसद ने सवाल उठाया कि गरीब को उजाड़कर आखिर कहां भेजा जाएगा? एक परिवार को एक ही जगह पक्का पट्टा दिया जाना चाहिए ताकि बार-बार जमीन और कब्जे का विवाद ही पैदा न हो।

वन विभाग का सख्त रुख, कब्जेदारों पर कार्रवाई तय
दूसरी ओर वन विभाग का कहना है कि वन भूमि पर किसी भी कीमत पर अवैध कब्जा नहीं रहने दिया जाएगा। विभाग का स्पष्टीकरण है कि यह कार्रवाई मूल विस्थापितों के खिलाफ नहीं, बल्कि वन भूमि पर कब्जा करके मिर्च और धान की खेती करने वालों पर की गई है। वन क्षेत्राधिकारी अमित श्रीवास्तव ने बताया कि विस्थापन की आड़ में वन भूमि कब्जाने की कोशिश को किसी भी स्थिति में प्रशासनिक संरक्षण नहीं दिया जाएगा।

कागजात न मिलने पर डीएम के निर्देश पर हुई कार्रवाई
प्रशासनिक पक्ष के अनुसार, कार्रवाई अचानक नहीं की गई। संबंधित लोगों से जमीन के वैध दस्तावेज मांगे गए थे और तत्कालीन एसडीएम विकास मित्तल व सीओ नामेन्द्र द्वारा थाने पर सुनवाई भी बुलाई गई थी। जब लोग दस्तावेज पेश नहीं कर सके, तब मामला जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग तक पहुंचा और उनके स्पष्ट निर्देशों के बाद ही जमीन को कब्जामुक्त कराने के लिए बुलडोजर चलाया गया।

1973 से जुड़ा है 53 साल पुराना विस्थापन का पेच
भरदुआ की इस समस्या की जड़ें करीब 53 साल पुरानी हैं। वर्ष 1973-74 में भेड़ प्रजनन फार्म भैंसौड़ा के लिए लगभग 4,798.95 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। उस दौरान करीब 1200 परिवारों को हटाकर मझगावा, भरदुआ सहित अन्य स्थानों पर विस्थापित किया गया था। वहीं से जमीन के मालिकाना हक का यह जटिल पेच शुरू हुआ, जो पांच दशक बीत जाने के बाद भी पूरी तरह नहीं सुलझ सका है।

नेताओं की सियासी सैर बनाम वास्तविक समाधान
बुलडोजर चलने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं का भरदुआ पहुंचना जारी है। हालांकि, केवल कार्रवाई रोकने या बुलडोजर का विरोध करने से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। असली फैसला तभी होगा जब अवैध अतिक्रमणकारी और वास्तविक पात्र विस्थापित की पहचान साफ हो। अब पूरा मामला प्रशासन के पाले में है, जिसे सांसद के फॉर्मूले को ध्यान में रखते हुए जमीन और अधिकारों पर पारदर्शी व अंतिम फैसला लेना होगा।

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