DFO के एक आदेश से सहमा वन विभाग, 31 कर्मचारियों का तबादला कर खत्म किया 'कम्फर्ट जोन', नयी तैनाती की जारी हुयी लिस्ट
काशी वन्य जीव प्रभाग के डीएफओ बी. शिव शंकर ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए 31 वन कर्मचारियों का तबादला कर दिया है। वर्षों की कानूनी लड़ाई और धरने के बाद नौकरी पाने वाले इन कर्मियों को अब मैदानी इलाकों को छोड़ दुर्गम पहाड़ी रेंजों में मुस्तैदी दिखानी होगी।
डीएफओ के आदेश से मची खलबली
एक साथ 31 वन कर्मचारियों का तबादला
सालों पुरानी प्रशासनिक जड़ता को तोड़ा
मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ी रेंजों में तैनाती
जंगल की नौकरी सुविधा आधारित नहीं
चंदौली जिले में काशी वन्य जीव प्रभाग से इस वक्त की एक बहुत बड़ी प्रशासनिक खबर सामने आ रही है। वर्षों तक धरना-प्रदर्शन, नारेबाजी और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद वन विभाग में नौकरी हासिल करने वाले 'समान कार्य समान वेतन' कर्मचारियों के लिए प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) बी. शिव शंकर ने एक बड़ा और कड़ा संदेश जारी किया है।
डीएफओ ने एक ही झटके में एक बड़ा स्थानांतरण आदेश जारी करते हुए प्रभाग के 31 कर्मचारियों का कार्यक्षेत्र पूरी तरह से बदल दिया है। इस कड़े फैसले के बाद पूरे वन विभाग में अचानक हलचल तेज हो गई है। डीएफओ के इस कदम को महज एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विभाग में अनुशासन की नई दिशा तय करने वाले बड़े फैसले के रूप में देखा जा रहा है।

डीएफओ का संदेश: 'जंगल की नौकरी है घर की नहीं'
प्रभागीय वनाधिकारी बी. शिव शंकर ने इस तबादला सूची के माध्यम से विभाग के भीतर एक बेहद स्पष्ट और कड़ा संदेश देने का प्रयास किया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वन विभाग की नौकरी केवल अपने गृह क्षेत्र या अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं के अनुसार नहीं चलाई जा सकती है।
इस आदेश के तहत कई ऐसे कर्मचारियों को झटका लगा है जो लंबे समय से मैदानी रेंजों में जमे हुए थे। अब इन कर्मचारियों को दुर्गम पहाड़ी इलाकों में भेज दिया गया है, जबकि कुछ अन्य कर्मियों को नई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इस बड़े बदलाव से कर्मचारियों के बीच अपनी नई तैनाती को लेकर गहन चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

वर्षों पुरानी प्रशासनिक जड़ता को तोड़ा
विभागीय गलियारों और सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, वन विभाग के भीतर पिछले काफी लंबे समय से एक ही रेंज में लंबे समय तक टिके रहने वाले कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और शिकायतें होती रहती थीं।
ऐसे सुस्त माहौल में डीएफओ बी. शिव शंकर का यह अचानक लिया गया फैसला एक बड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप के रूप में उभरकर सामने आया है। वन विभाग के वरिष्ठ सूत्रों का मानना है कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य सभी रेंजों में वन कर्मचारियों की उपलब्धता को पूरी तरह से संतुलित करना और फील्ड के कार्यों को जमीनी स्तर पर अधिक प्रभावी बनाना है।

पहाड़ और मैदान के बीच बना नया संतुलन
डीएफओ द्वारा जारी किए गए इस आधिकारिक आदेश के अंतर्गत नौगढ़, जयमोहनी, चकिया, चंद्रप्रभा और मुगलसराय समेत प्रभाग की विभिन्न रेंजों में कार्यरत 31 कर्मचारियों का कार्यक्षेत्र तत्काल प्रभाव से बदला गया है।
इस सूची में कई कर्मचारियों को सुगम मैदानी क्षेत्रों से हटाकर सुदूर पहाड़ी रेंजों की विषम परिस्थितियों में ड्यूटी करने के लिए भेजा गया है। वहीं दूसरी तरफ, पहाड़ पर तैनात काफी समय बिता चुके कई कर्मचारियों को अब मैदानी क्षेत्रों में लाकर नई जिम्मेदारी दी गई है। उच्च अधिकारियों का मानना है कि इस नए संतुलन से वन संरक्षण, रात की गश्त और अवैध शिकारियों के खिलाफ निगरानी व्यवस्था को पहले से अधिक मजबूती मिलेगी।
कर्मचारियों का "कम्फर्ट जोन" खत्म करने की बड़ी कवायद
वन विभाग के प्रशासनिक हलकों में इस कड़े आदेश को केवल एक रूटीन ट्रांसफर प्रक्रिया नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसे विभाग की पुरानी कार्यसंस्कृति को बदलने के एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
इस आदेश के जरिए अब कर्मचारियों के बीच यह कड़ा संदेश प्रसारित किया जा रहा है कि विभागीय जिम्मेदारी किसी एक पसंदीदा रेंज तक कभी सीमित नहीं रह सकती। भविष्य में भी जहां वन और वन्यजीवों के संरक्षण को सबसे पहली प्राथमिकता दी जाएगी, वहां हर परिस्थिति में कर्मचारियों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित कराई जाएगी।
विभाग में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना ट्रांसफर
एक साथ प्रभाग के इतने बड़े पैमाने पर 31 कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र को बदल दिए जाने का यह गंभीर मामला इस समय पूरे काशी वन्य जीव प्रभाग में कौतूहल और चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है।
जहां एक तरफ विभाग के कई प्रभावित कर्मचारी इस आदेश को प्रशासनिक सख्ती और अपने प्रति कड़ा रुख मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विभागीय उच्च अधिकारियों का साफ तौर पर कहना है कि यह कदम केवल और केवल राजकीय कार्यकुशलता और सरकारी कामकाज को बढ़ाने की दिशा में एक बेहद आवश्यक कदम है।
चर्चा के केंद्र में आए डीएफओ बी. शिव शंकर
इस पूरे बड़े प्रशासनिक घटनाक्रम और फेरबदल के केंद्र में इस समय प्रभाग के डीएफओ बी. शिव शंकर बने हुए हैं। विभागीय कर्मचारियों के बीच लगातार यह बात घूम रही है कि डीएफओ ने बिना किसी दबाव के यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वन विभाग की असली पहचान केवल उनके फील्ड वर्क से होती है, न कि किसी की व्यक्तिगत सुविधा पर आधारित वीआईपी तैनाती से। विभागीय आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखते हुए लिया गया यह बड़ा फैसला आने वाले समय में वन विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर एक व्यापक और सकारात्मक असर डाल सकता है।
जहां जरूरत होगी, वहीं पर करनी होगी ड्यूटी: डीएफओ
पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए डीएफओ बी. शिव शंकर ने यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि वन विभाग की असली पहचान सिर्फ और सिर्फ उनके फील्ड वर्क और मुस्तैदी से ही है। वन और वन्यजीव संरक्षण के महत्वपूर्ण कार्यों में किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि वन विभाग की सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकारी जंगलों और बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा करना है। इसके लिए विभाग को जहां भी, जब भी कर्मचारियों की सबसे ज्यादा आवश्यकता महसूस होगी, वहां बिना किसी हिचकिचाहट के उनकी तैनाती की जाएगी। विभागीय कार्य हर हाल में सर्वोपरि है और भविष्य में भी इसी के आधार पर कड़े निर्णय लिए जाते रहेंगे। यही वजह है कि इस आदेश को वन विभाग में अनुशासन, जवाबदेही और एक सक्रिय कार्यसंस्कृति स्थापित करने की दिशा में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
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