जिले का पहला ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टलMovie prime

नौगढ़ के जंगल हो रहे हैं बीमार, धीर-धीरे सारस हो गए गायब, जीव-गणना में खुली पोल

एशिया के पुराने अभयारण्यों में शुमार चंद्रप्रभा सेंचुरी से सारस पक्षियों का पूरी तरह गायब होना जैव-विविधता के लिए खतरे की घंटी है। ताज़ा गणना के मुताबिक, जलस्रोतों के सूखने और मानवीय हस्तक्षेप ने इस प्राकृतिक तंत्र को बीमार कर दिया है।

 
 

चंद्रप्रभा अभयारण्य से सारस विलुप्त

गणना में एक भी सारस नहीं मिला

जंगल का बिगड़ा प्राकृतिक संतुलन

सूखते जलस्रोत और मानवीय दखल

चंदौली जिले के तहसील नौगढ़ स्थित चंद्रप्रभा वन्य जीव अभयारण्य से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। हाल ही में संपन्न हुई वन्य जीव गणना के आंकड़ों ने पर्यावरणविदों और वन विभाग की नींद उड़ा दी है। गणना के दौरान अभयारण्य क्षेत्र में एक भी सारस पक्षी की मौजूदगी दर्ज नहीं की गई है। वन्य जीव विज्ञान की दृष्टि से सारस का गायब होना केवल एक प्रजाति का लुप्त होना नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि नौगढ़ के जंगलों का स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभयारण्य का जल, भूमि और जैव तंत्र संतुलन अब पूरी तरह से टूट चुका है।

 Chandraprabha Wildlife Sanctuary News, Saras Crane Extinction Naugadh, Ecosystem Indicator Bird Loss

सारस की अनुपस्थिति: प्राकृतिक तंत्र की विफलता का पैमाना
वन्य जीव विज्ञान में सारस पक्षी को ‘इकोसिस्टम इंडिकेटर’ यानी पारिस्थितिकी तंत्र का सूचक माना जाता है। यह पक्षी केवल उन्हीं स्थानों पर निवास करता है जहाँ का जल शुद्ध हो, तालाब छिछले हों और मानवीय शोर-शराबे से दूर प्राकृतिक शांति हो। चंद्रप्रभा से सारस का पूरी तरह खत्म हो जाना इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि यहां का जैविक स्थल अब उनके रहने लायक नहीं बचा है। छिछले जल क्षेत्रों के सूखने और दलदली भूमि के विनाश ने सारस के भोजन चक्र और प्रजनन स्थलों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है, जिसके कारण इन पक्षियों ने इस ऐतिहासिक सेंचुरी से अपना नाता तोड़ लिया है।

 Chandraprabha Wildlife Sanctuary News, Saras Crane Extinction Naugadh, Ecosystem Indicator Bird Loss

इंसानी दखल और सूखते जलस्रोतों ने बिगाड़ी जंगल की लय
चंद्रप्रभा सेंचुरी में बढ़ती मानवीय गतिविधियां, अवैध आवाजाही और वन भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण इस विनाश के मुख्य कारण माने जा रहे हैं। जंगल के भीतर इंसानी दखल ने उस प्राकृतिक शांति को भंग कर दिया है जिसकी तलाश में दुर्लभ पक्षी यहाँ आते थे। इसके अलावा, सेंचुरी क्षेत्र के कई प्राचीन तालाब और प्राकृतिक जलस्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर गाद जमा होने के कारण अपनी संरचना खो चुके हैं। जब पीने का पानी और रहने का सुरक्षित ठिकाना ही नहीं बचा, तो सारस के साथ-साथ कई अन्य वन्य जीवों ने भी सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर लिया है।

1957 में स्थापित अभयारण्य के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न
वर्ष 1957 में जब चंद्रप्रभा को वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया था, तब इसका मुख्य उद्देश्य दुर्लभ प्रजातियों को सुरक्षित आश्रय देना था। लेकिन आज, दशकों बाद स्थिति यह है कि अभयारण्य अपनी पहचान खोने की कगार पर है। वन विभाग की संरक्षण नीतियां और धरातल पर किए गए कार्यों पर अब सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, डीएफओ बी. शिवशंकर (IFS) का कहना है कि विभाग जलस्रोतों के पुनर्जीवन और प्राकृतिक आवास सुधार पर गंभीरता से काम कर रहा है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि आने वाले समय में इकोसिस्टम को पुनर्जीवित करने के लिए और भी ठोस कदम उठाए जाएंगे।

पर्यावरणविदों की चेतावनी: समय रहते नहीं जागे तो होगा पछतावा
पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आज अगर सारस गायब हुए हैं, तो कल अन्य प्रजातियों का भी यही हश्र होगा। यदि तत्काल प्रभाव से जल संरक्षण, प्राकृतिक आवास की बहाली और मानवीय हस्तक्षेप पर कड़ाई से नियंत्रण नहीं किया गया, तो चंद्रप्रभा सेंचुरी आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल इतिहास की किताबों और गाथाओं तक सीमित रह जाएगी। जंगल की इस बीमारी का इलाज केवल फाइलों में नहीं, बल्कि धरातल पर सक्रिय संरक्षण प्रयासों से ही संभव है।

Tags

चंदौली जिले की खबरों को सबसे पहले पढ़ने और जानने के लिए चंदौली समाचार के टेलीग्राम से जुड़े।*