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नौगढ़ के भरदुवा में बुलडोजर कार्रवाई पर भड़के सांसद छोटेलाल खरवार, बोले—क्या अफसर चंदौली में दूसरा उम्भा कांड दोहराना चाहते हैं?

चंदौली के नौगढ़ में दलित व आदिवासी परिवारों पर हुई बुलडोजर कार्रवाई के बाद सियासत गरमा गई है। पीड़ितों के बीच पहुंचे सोनभद्र सांसद छोटेलाल खरवार ने अफसरों को उम्भा कांड की याद दिलाते हुए इस मामले को संसद में उठाने की कड़ी चेतावनी दी है।

 
 

भरदुवा बुलडोजर कार्रवाई पर घमासान

पीड़ितों से मिले सांसद छोटेलाल खरवार

अफसरों को दी उम्भा कांड की चेतावनी

गरीबों की बेदखली पर उठे गंभीर सवाल

एसडीएम बोले—कागज हैं तो पेश करें

चंदौली जिले में तहसील नौगढ़ के भरदुवा गांव में दलित, पिछड़े और आदिवासी परिवारों पर हुई बुलडोजर कार्रवाई ने अब एक बड़ा सियासी रूप ले लिया है। इसे महज एक साधारण प्रशासनिक अतिक्रमण हटाओ अभियान मान लेना गलत होगा। इस कार्रवाई ने वन अधिकार कानून, गरीबों के आशियाने की सुरक्षा और स्थानीय प्रशासन की संवेदनशीलता पर बहुत बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार को पीड़ितों का दर्द बांटने गांव पहुंचे सोनभद्र के सांसद कुंवर छोटेलाल खरवार ने स्थानीय अधिकारियों पर सीधा और तीखा हमला बोला है, जिससे पूरे प्रशासनिक महकमे में खलबली मच गई है। सांसद ने साफ लहजे में चेतावनी दी है कि गरीबों के हक की यह लड़ाई अब थमने वाली नहीं है और इसकी गूंज सीधे देश की संसद तक जाएगी।

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पीड़ितों के आंसू पोंछने पहुंचे सांसद, उठाए कड़े सवाल
भरदुवा और बिशेषरपुर में बड़े पैमाने पर हुई इस बेदखली के बाद पहली बार कोई बड़ा जनप्रतिनिधि जमीनी हकीकत जानने इन पीड़ित परिवारों के बीच पहुंचा। सांसद कुंवर छोटेलाल खरवार ने बेघर हुए गरीब परिवारों से मुलाकात कर उनका हाल जाना और उनके आंसुओं को पोंछते हुए एसडीएम की इस कार्रवाई को घोर अन्याय करार दिया। सांसद ने खुलेआम आरोप लगाया कि पिछले कई दशकों से इन जमीनों पर खेती कर अपना पेट पाल रहे दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज के लोगों को बिना किसी मानवीय संवेदनशीलता के अचानक बेदखल कर दिया गया। उन्होंने प्रशासन पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि इलाके के रसूखदार और प्रभावशाली लोगों के कब्जों पर प्रशासन का यह बुलडोजर कभी क्यों नहीं चलता?

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"क्या अफसर दूसरा उम्भा कांड चाहते हैं?"
सांसद छोटेलाल खरवार ने प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई को लेकर अब तक का सबसे बड़ा और गंभीर आरोप मढ़ा। उन्होंने अधिकारियों को आगाह करते हुए कहा कि सोनभद्र के ऐतिहासिक और दर्दनाक उम्भा कांड से उत्तर प्रदेश के शासन-प्रशासन को बहुत बड़ा सबक लेना चाहिए था, लेकिन नौगढ़ के अफसर आज उसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए नजर आ रहे हैं। उन्होंने तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि आज निर्दोष गरीबों की जायज आवाज को पुलिस और बुलडोजर की ताकत के दम पर बेरहमी से दबाया जा रहा है। अगर प्रशासनिक अधिकारी इसी तरह हठधर्मिता पर अड़े रहे, तो पूरे क्षेत्र में एक बड़ा सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है, जिसकी पूरी जवाबदेही और जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ स्थानीय प्रशासन की होगी। उन्होंने कहा कि वे इस पूरे गंभीर मामले को संसद में उठाकर सरकार से सीधे जवाब मांगेंगे।

ग्रामीणों ने पुलिस पर लगाया ज्यादती का संगीन आरोप
सांसद के सामने अपना दुखड़ा रोते हुए पीड़ित ग्रामीण परिवारों ने बताया कि प्रशासन ने उनके लहलहाते खेतों को जबरन ट्रैक्टरों से जुतवा दिया। जब उन लोगों ने अपने पेट की खातिर इस अन्याय का विरोध करने का प्रयास किया, तो मौके पर मौजूद भारी पुलिस बल ने उनके खिलाफ लाठियां चमकाईं और सख्त बल प्रयोग कर उन्हें खदेड़ दिया। ग्रामीणों का स्पष्ट रूप से दावा है कि वे पीढ़ियों से इस बंजर जमीन को उपजाऊ बनाकर खेती कर रहे थे। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि सरकार उन्हें वन अधिकार कानून के तहत इस जमीन का मालिकाना हक देगी, लेकिन इसके विपरीत उनके बने-बनाए आशियाने ढहा दिए गए और उनकी रोजी-रोटी छीन ली गई।

क्या वन अधिकार कानून को किनारे रखकर हुई कार्रवाई?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा और पेचीदा कानूनी प्रश्न यही उठ रहा है कि जो परिवार दशकों से इस जमीन पर काबिज रहने का पुख्ता दावा कर रहे हैं, क्या प्रशासन द्वारा उनके दावों का बारीकी से परीक्षण किया गया था? क्या वन अधिकार कानून के तहत दी जाने वाली राहतों और प्रावधानों का इस केस में पालन हुआ? यदि प्रशासन ने कोई सर्वे कराया था तो उसकी रिपोर्ट और रिकॉर्ड कहाँ हैं? और यदि बिना जांच के यह कदम उठाया गया है, तो इतनी बड़ी बेदखली का असली आधार क्या है? यही सवाल अब इस पूरे मामले को कानूनी और राजनीतिक बहस के चौराहे पर लाकर खड़ा कर रहा है, जिससे टकराव की स्थिति बढ़ती जा रही है।

एसडीएम नौगढ़ ने दी सफाई—सरकारी है जमीन
इन तीखे राजनीतिक हमलों और आरोपों के बीच एसडीएम नौगढ़ विनय मिश्रा ने अपनी और प्रशासन की कार्रवाई का बचाव करते हुए पक्ष रखा है। उन्होंने बताया कि संबंधित विवादित भूमि पूरी तरह से राजस्व और वन विभाग के सरकारी अभिलेखों में 'सरकारी जमीन' के तौर पर दर्ज है। उन्होंने कहा कि यह पूरी कार्रवाई किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर जांच के बाद की गई है और इसमें किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ है। एसडीएम ने कहा कि यदि किसी भी ग्रामीण या प्रभावित व्यक्ति के पास इस जमीन से जुड़े कोई भी वैध और पक्के दस्तावेज हैं, तो वह बेझिझक तहसील कार्यालय में आकर प्रस्तुत करे। प्रशासन उन कागजात की पूरी निष्पक्षता से जांच करेगा और नियमानुसार जो भी उचित कार्रवाई होगी, वह अमल में लाई जाएगी।

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