नौगढ़ तहसील में SDM के आदेश पर भारी लेखपालों की मनमानी, 10 साल में बदल गए 5 एसडीएम, लेकिन नहीं बदले लेखपाल
चंदौली के नौगढ़ तहसील में सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ रही हैं। बाघी पंचायत की महिला ग्राम प्रधान नीलम ओहरी एसडीएम के दो-दो आदेशों के बावजूद पिछले डेढ़ साल से अपनी ही जमीन पर कब्जा पाने और पैमाइश के लिए भटक रही हैं।
बाघी की ग्राम प्रधान नीलम ओहरी डेढ़ साल से परेशान
एसडीएम के दो-दो आदेशों के बाद भी नहीं हुई पैमाइश
18 जुलाई को महिला प्रधान ने फिर लगाई गुहार
लौवारी कला के प्रधान यशवंत सिंह भी उठा चुके हैं सवाल
अधिवक्ताओं ने भी पूर्व में खोला था भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा
चंदौली जिले के नौगढ़ तहसील में इन दिनों सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हालत यह है कि आम जनता तो दूर, यहाँ निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। ताजा मामला बाघी ग्राम पंचायत की महिला प्रधान नीलम ओहरी से जुड़ा है। वे अपनी ही खरीदी हुई जमीन का मालिकाना हक और कब्जा पाने के लिए पिछले करीब डेढ़ साल से तहसील के दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। जमीन का नामांतरण (दाखिल-खारिज) होने और एसडीएम के स्पष्ट निर्देश के बाद भी नीचे का प्रशासनिक अमला टस से मस नहीं हो रहा है।
एसडीएम के दो-दो आदेश... फिर भी नहीं पहुंची राजस्व टीम
ग्राम प्रधान नीलम ओहरी के अनुसार, जमीन का नामांतरण होने के बाद कोर्ट के जरिए धारा-24 के तहत पैमाइश का बकायदा आदेश जारी किया गया था। इसके बाद तहसील प्रशासन की ओर से छह दिन के भीतर मौके पर राजस्व टीम भेजने का कड़ा निर्देश भी दिया गया, लेकिन लेखपालों की मनमानी के चलते दोनों आदेश फाइलों में ही दबे रह गए। हारकर 18 जुलाई को महिला प्रधान को एक बार फिर खुद एसडीएम कार्यालय पहुंचकर न्याय की गुहार लगानी पड़ी। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब एक ग्राम प्रधान को अपने हक के लिए इतना भटकना पड़ रहा है, तो आम गरीब और किसानों की क्या स्थिति होगी?

10 साल में बदल गए 5 एसडीएम, लेकिन नहीं बदली व्यवस्था
पिछले एक दशक में नौगढ़ तहसील में पांच से अधिक एसडीएम आए और चले गए। हर बार भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और पारदर्शिता बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन धरातल पर राजस्व व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें जस की तस बनी हुई हैं। इससे पहले लौवारी कला पंचायत के ग्राम प्रधान यशवंत सिंह यादव भी राजस्व टीम और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर आवाज उठा चुके हैं, जिसके बाद एक लेखपाल को वहां से हटाया गया था। कुछ महीने पहले तहसील परिसर में अधिवक्ताओं ने भी लेखपालों की कथित वसूली और रिश्वतखोरी को लेकर मोर्चा खोला था, जिसे बाद में एडीएम न्यायिक के हस्तक्षेप से शांत कराया गया था।
अब जिम्मेदारी तय करने का समय
यह पूरा मामला अब केवल एक महिला प्रधान की जमीन का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता के भरोसे का सवाल है। समय पर पैमाइश न होने से ग्रामीण इलाकों में आपसी विवाद और मुकदमेबाजी लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र के लोगों की निगाहें अब जिला प्रशासन और नए एसडीएम पर टिकी हैं कि क्या वे इस लापरवाही की निष्पक्ष जांच कराकर दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई करेंगे या फिर कागजी आदेशों का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा।
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