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नौगढ़ में 43 KM सड़कें बनीं खंडहर, 57 गांवों की जनता का फूटा गुस्सा— आखिर 1.5 करोड़ के बजट का हिसाब कौन देगा?

चंदौली के नौगढ़ तहसील में रिठिया-चकरघट्टा और लालतापुर-मझगाई समेत चार प्रमुख मार्गों की 43 किलोमीटर सड़कें पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं। कागजों पर 1.5 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी जमीन पर गड्ढे ही गड्ढे हैं।

 
 

नौगढ़ तहसील में 43 किलोमीटर सड़कें बनीं खंडहर

बदहाल सड़कों के जाल में फंसे 57 गांवों के लोग

पिछले तीन वर्षों में 1.5 करोड़ खर्च का आरोप

मरीजों को अस्पताल और बच्चों को स्कूल जाने में आफत

ग्रामीणों की मांग— जिलाधिकारी खुद करें स्थलीय निरीक्षण

सरकार भले ही "विकसित भारत" का एक सुंदर सपना दिखा रही हो, लेकिन चंदौली जिले की सुदूर और पहाड़ी नौगढ़ तहसील से जो जमीनी हकीकत सामने आ रही है, वह बेहद डरावनी है। नौगढ़ क्षेत्र के रिठिया-चकरघट्टा, लालतापुर-मझगाई और होरिला-धोबही समेत चार प्रमुख मार्गों की करीब 43 किलोमीटर लंबी सड़कें आज पूरी तरह से गहरे गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। इन्हीं बदहाल सड़कों के भरोसे इस इलाके के करीब 57 गांवों के हजारों लोग रोज अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं।

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सड़क नहीं, हादसों का खुला न्योता बन चुके हैं मार्ग
स्थानीय ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि इन मार्गों के निर्माण और समय-समय पर होने वाली मरम्मत के नाम पर कागजों में करीब 1.5 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च कर दिया गया। लेकिन धरातल पर इसकी कोई झलक दिखाई नहीं देती। रिठिया-चकरघट्टा मार्ग पर बरसात के दिनों में इतने बड़े-बड़े गड्ढे हो जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा। लालतापुर-मझगाई मार्ग पर स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों, बाइक सवारों और बुजुर्गों के लिए हर दिन का सफर एक भयानक दुःस्वप्न जैसा बन गया है।

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57 गांवों की अर्थव्यवस्था और जनजीवन हुआ ठप
इन चारों खराब रास्तों के कारण मरीजों को समय पर एम्बुलेंस या अस्पताल तक पहुँचाना भी नामुमकिन जैसा हो गया है। इस बदहाल व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत यहाँ के गरीब किसान, छोटे व्यापारी और छात्र चुका रहे हैं। मंडी तक अपनी तैयार फसल पहुँचाने में किसानों का समय और भाड़ा दोनों दोगुना हो गया है। व्यापारियों का कहना है कि टूटी सड़कों के कारण उनके वाहनों का मेंटेनेंस बहुत महंगा हो गया है, जिससे ग्रामीण बाजार और पूरा कारोबार पूरी तरह चौपट हो रहा है।

हर साल बजट साफ, लेकिन जनता क्यों है बेहाल?
ग्रामीणों का कहना है कि लोक निर्माण विभाग (PWD) हर साल सड़क मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये डकार जाता है, लेकिन कुछ ही महीनों में गिट्टियां उखड़ जाती हैं। पिछले तीन सालों में यहाँ 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान दिखाया गया है, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है। कई बार संपूर्ण समाधान दिवस पर शिकायतें की गईं, सोशल मीडिया पर बदहाल सड़कों के वीडियो भी वायरल हुए और स्थानीय विधायक ने भी पत्र लिखे, लेकिन पीडब्ल्यूडी विभाग हर बार "टेंडर प्रक्रिया चल रही है" का रटा-रटाया बहाना बनाकर चुप्पी साध लेता है।

अब सीधे जिलाधिकारी से जांच की उम्मीद
यह गंभीर मामला अब सिर्फ सड़कों का नहीं, बल्कि 57 गांवों की सुरक्षा और सरकारी तंत्र पर जनता के भरोसे का है। बिना दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय किए इस समस्या का कोई स्थायी इलाज संभव नहीं है। क्षेत्र की जनता की पुरजोर मांग है कि वर्तमान जिलाधिकारी को स्वयं इन चारों सड़कों का स्थलीय निरीक्षण (ग्राउंड जीरो पर जाकर जांच) करना चाहिए। यदि वित्तीय गड़बड़ी या घटिया निर्माण साबित होता है, तो दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो और बरसात को देखते हुए इन सड़कों को तुरंत युद्धस्तर पर गड्ढामुक्त कराया जाए।

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