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₹25 लाख के डिजिटल मलेवर गांव पंचायत भवन पर लटकता है ताला, अंदर कंप्यूटर गायब और अंदर मिला चूल्हा और बिस्तर

चंदौली के नौगढ़ स्थित मलेवर गांव में ₹25 लाख की लागत से बना बहुउद्देशीय पंचायत भवन अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। डिजिटल विलेज के दावों के बीच भवन में ताला लटका है, कंप्यूटर गायब हैं और अंदर चूल्हा-बिस्तर सजा हुआ है।

 
 

पच्चीस लाख का डिजिटल पंचायत भवन

मुख्य सरकारी दफ्तर से कंप्यूटर गायब

अंदर दिखाई दिया बिस्तर और चूल्हा

बीडीओ विकास सिंह के दावे फेल

डीएम चंद्र मोहन गर्ग से सीधी मांग

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गांवों को आधुनिक और सर्वसुविधाजनक “डिजिटल विलेज” बनाने के बड़े-बड़े दावों के बीच चंदौली जिले के विकास खंड नौगढ़ से एक बेहद चौंकाने वाला और सरकारी दावों की हवा निकालने वाला मामला सामने आया है। क्षेत्र का मलेवर गांव अब प्रशासनिक लापरवाही और अफसरशाही का एक बड़ा जीवंत उदाहरण बनकर खड़ा हो गया है। शासन की मंशा के अनुरूप जिस बहुउद्देशीय पंचायत भवन को ग्रामीणों के लिए स्थानीय स्तर पर सभी सरकारी डिजिटल सेवाओं का मुख्य केंद्र बनना था, वहां धरातल पर न तो कोई कंप्यूटर मिला, न कोई जिम्मेदार कर्मचारी और न ही किसी प्रकार की इंटरनेट या डिजिटल व्यवस्था दिखाई दी।

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₹25 लाख का सरकारी भवन बना निजी ठिकाना, अंदर मिला चूल्हा-बिस्तर
'चंदौली समाचार' की टीम द्वारा जब मलेवर गांव में जमीनी पड़ताल की गई, तो सच बेहद हैरान करने वाला था। जनता की सहूलियत के लिए करीब ₹25 लाख की भारी-भरकम सरकारी धनराशि खर्च करके तैयार किए गए इस आलीशान बहुउद्देशीय पंचायत भवन के मुख्य द्वार पर बड़ा सा ताला लटका हुआ मिला। हद तो तब हो गई जब खिड़कियों से अंदर झांकने पर पता चला कि डिजिटल सेवा केंद्र के मुख्य कमरों में कंप्यूटर और तकनीकी उपकरणों के बजाय निजी बिस्तर और खाना पकाने का चूल्हा सजा हुआ था। सबसे बड़ी विरोधाभासी बात यह है कि इसी बंद पड़े और बदहाल भवन को लेकर ब्लॉक स्तर के आला अधिकारी जिले में इसके “सुचारु और नियमित संचालन” का कागजी दावा ठोक रहे हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिलाधिकारी महोदय फाइलों की सरकारी रिपोर्टों पर भरोसा करें या धरातल की इन चीखती हुई तस्वीरों पर?

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ग्रामीणों को नहीं मिल रहा लाभ, ब्लॉक और तहसील की दौड़ जारी
सरकार ने इस बहुउद्देशीय भवन का निर्माण इसलिए कराया था ताकि गांव के गरीब, बुजुर्ग, महिलाओं और जरूरतमंद लोगों को आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, पेंशन आवेदन और अन्य आवश्यक सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए भटकना न पड़े और पंचायत स्तर पर ही त्वरित समाधान मिल सके। लेकिन मलेवर गांव में हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत भवन बनने के बाद उन्हें बड़ी उम्मीदें जगी थीं कि अब उनके समय और पैसे दोनों की बचत होगी, लेकिन लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जाने के बाद भी यह भवन आम जनता के किसी काम नहीं आ रहा है। ग्रामीणों को आज भी छोटे-छोटे कामों के लिए कई किलोमीटर दूर ब्लॉक और तहसील मुख्यालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जिससे पुरानी लचर व्यवस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है।

बीडीओ विकास सिंह के दावे हुए बेनकाब, जवाबदेही तय करने की मांग
इस पूरे गंभीर मामले पर जब खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) विकास सिंह से बात की गई, तो उन्होंने बेहद रटा-रटाया जवाब देते हुए दावा किया कि मलेवर पंचायत भवन का संचालन पूरी तरह से सुचारु रूप से किया जा रहा है और वहां सारी व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं। हालांकि, मौके से सामने आईं तस्वीरें बीडीओ साहब के इन दावों को पूरी तरह खारिज और बेनकाब कर रही हैं। यदि वहां नियमित रूप से काम हो रहा है, तो काम के समय ताला क्यों लटका था और सरकारी संपत्ति को घरेलू इस्तेमाल की जगह में किसने तब्दील किया?

अब क्षेत्र की पूरी जनता की निगाहें चंदौली के कर्मठ जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग पर टिकी हुई हैं। ग्रामीणों और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों ने सामूहिक रूप से डीएम साहब से यह सीधा सवाल पूछा है कि क्या ₹25 लाख के सरकारी धन की इस बर्बादी और फर्जी दावों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाएगी? ग्रामीणों ने मांग की है कि इस कागजी “सुचारु संचालन” का ऑन-स्पॉट भौतिक सत्यापन कराया जाए और जनता के पैसों का मखौल उड़ाने वाले दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों की जवाबदेही तय कर उन पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

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