प्रधान-अधिकारी की 'जुगलबंदी'? भ्रष्टाचारी प्रधान पर कार्रवाई से कतरा रहे अधिकारी, कांवर गांव का घोटाला ठंडे बस्ते में
यूपी के चंदौली में भ्रष्टाचार का अनोखा मामला सामने आया है। कांवर गांव की प्रधान ने अपनी ही निजी फर्मों में सरकारी बजट खपा दिया। डीपीआरओ की जांच में दोष सिद्ध होने के बाद भी प्रशासन मौन है। आखिर किसे बचा रहे हैं अधिकारी?
ग्राम प्रधान पर सरकारी धन के बंदरबांट का आरोप
निजी और देवर की फर्म को किया अवैध भुगतान
डीपीआरओ की जांच रिपोर्ट में प्रधान पाई गईं दोषी
भ्रष्टाचार पर प्रशासनिक अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी
चहनिया ब्लॉक के कांवर गांव का है पूरा मामला
ग्राम प्रधान पर सरकारी धन के बंदरबांट का आरोप
निजी और देवर की फर्म को किया अवैध भुगतान
डीपीआरओ की जांच रिपोर्ट में प्रधान पाई गईं दोषी
भ्रष्टाचार पर प्रशासनिक अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी
चहनिया ब्लॉक के कांवर गांव का है पूरा मामला
चंदौली जिले में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार प्रदेश में 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा करती है। मुख्यमंत्री बार-बार मंचों से भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने की चेतावनी देते हैं, लेकिन चंदौली जनपद के चहनिया ब्लॉक अंतर्गत कांवर गांव से जो मामला सामने आया है, वह इन दावों की हवा निकाल रहा है। यहां नियमों को ताक पर रखकर सरकारी धन का उपयोग निजी लाभ के लिए किया गया, और हैरानी की बात यह है कि दोष सिद्ध होने के बावजूद जिला प्रशासन कार्रवाई करने से कतरा रहा है।
निजी फर्मों में खपाया सरकारी पैसा: हितों का टकराव
कांवर गांव में ग्राम प्रधान की कार्यशैली पर वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप लगे हैं। जानकारी के अनुसार, ग्राम प्रधान ने विकास कार्यों का भुगतान किसी बाहरी वेंडर या अधिकृत एजेंसी को करने के बजाय अपनी ही निजी फर्म 'महालक्ष्मी इंटरप्राइजेज' और अपने देवर के नाम से संचालित 'अमरावती इंटरप्राइजेज' को करा दिया। पंचायती राज व्यवस्था के नियमों के अनुसार, कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि सरकारी कार्यों का भुगतान अपनी या अपने परिजनों की फर्म को नहीं कर सकता। यह सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) और पद के दुरुपयोग का मामला है।
जांच में दोष सिद्ध, फिर भी फाइलें गायब
इस घोटाले की गूंज जब जिला मुख्यालय तक पहुंची, तो जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) ने इसकी जांच कराई। विश्वसनीय सूत्रों और जांच रिपोर्ट के अनुसार, डीपीआरओ ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि ग्राम प्रधान द्वारा किया गया यह भुगतान वित्तीय नियमों का उल्लंघन है और इसमें प्रधान सीधे तौर पर दोषी हैं। लेकिन, विडंबना देखिए कि रिपोर्ट तैयार होने के कई दिन बीत जाने के बाद भी दोषी प्रधान के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। प्रशासनिक गलियारों में केवल फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर घूम रही हैं।
राजनीतिक संरक्षण और अधिकारियों की मजबूरी
ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि ग्राम प्रधान को जिले के कुछ प्रभावशाली राजनीतिक दिग्गजों का संरक्षण प्राप्त है। इसी 'रसूख' के चलते अधिकारी जांच रिपोर्ट को दबाकर बैठे हैं। स्थानीय निवासी रामसिंह और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी केवल खानापूर्ति कर रहे हैं ताकि समय बीतने के साथ मामला ठंडे बस्ते में चला जाए। ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि क्या योगी सरकार का हंटर केवल आम आदमी के लिए है? क्या रसूखदार प्रधानों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट मिली हुई है?
सिस्टम की साख पर उठते गंभीर सवाल
कांवर गांव का यह प्रकरण अब केवल एक गांव का भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की साख का सवाल बन गया है। जब जिम्मेदार अधिकारी स्वयं भ्रष्टाचार की पुष्टि कर रहे हैं, तो कार्रवाई न होना उनकी कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करता है। इससे न केवल सरकारी धन की लूट हो रही है, बल्कि आम जनता का प्रशासन और न्याय व्यवस्था से भरोसा भी उठ रहा है।
ग्रामीणों की चेतावनी: नहीं हुई कार्रवाई तो होगा आंदोलन
इस मामले को लेकर पूरे चहनिया ब्लॉक में आक्रोश व्याप्त है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही दोषी ग्राम प्रधान के खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई और पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो वे कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे। अब देखना यह होगा कि चंदौली के आला अधिकारी मुख्यमंत्री के 'जीरो टॉलरेंस' के संकल्प को पूरा करते हैं या भ्रष्टाचार के इस खेल में मूकदर्शक बने रहते हैं।
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