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पंचायत समाधान दिवस को फरियादियों ने दिखाया ठेंगा, खत्म हो रहा है चौपाल से भरोसा

नौगढ़ इलाके की हकीकत यह है कि गांवों की परेशानियां खत्म नहीं हुई हैं। मनरेगा मजदूरी महीनों से बकाया है, मजदूर दर-दर भटक रहे हैं।
 

3 घंटे की चौपाल में रहा सन्नाटा

काफी देर तक नहीं पहुंचे फरियादी

एसडीएम और नायब तहसीलदार करते रहे इंतजार

चंदौली जिले के तहसील नौगढ़ में जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग के निर्देश पर बुधवार को पंचायत समाधान दिवस का आयोजन किया गया। सात पंचायतों में चौपाल ने मानो चमत्कार कर दिया—सिर्फ तीन घंटे में गांवों की सारी समस्याएं खत्म हो गईं, क्योंकि फरियादी पहुंचे ही नहीं। सवाल यह है कि जब बाघी, और मझगांवां जैसी पंचायतों में एसडीएम और नायब तहसीलदार खुद मौजूद थे, तब भी गांव के लोग अपनी शिकायतें लेकर क्यों नहीं आए? क्या चौपाल पर भरोसा टूट चुका है। 

panchayat samadhan diwas

अफसर पहुंचे, जनता क्यों नहीं
आपको बता दें कि बाघी पंचायत में CSC पर एसडीएम विकास मित्तल पहुंचे, मझगांवां और ठठवा में नायब तहसीलदार प्रभुनाथ यादव मौजूद रहे। जबकि शमसेरपुर में कानूनगो तथा धन कुंवारी कला, बरबसपुर और देवरी कला में पंचायत सचिव, लेखपाल और प्रधान फरियादियों का इंतज़ार करते रह गए। नतीजा यह रहा कि बाघी में केवल एक फरियादी और शमशेरपुर में महज़ दो फरियादी पहुंचे। सवाल यह है कि जब अधिकारी खुद गांव आए, फिर भी ग्रामीण अपनी समस्याएं लेकर क्यों नहीं आए?

गांवों की समस्याएं जस की तस 
नौगढ़ इलाके की हकीकत यह है कि गांवों की परेशानियां खत्म नहीं हुई हैं। मनरेगा मजदूरी महीनों से बकाया है, मजदूर दर-दर भटक रहे हैं। खाते से रकम निकाली जा चुकी है, इसके बावजूद बस्तियों के हैंडपंप खराब पड़े हैं, लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। गांव सभा की जमीन पर कब्जे का विवाद भी सालों से लंबित है। इसके बावजूद चौपाल में इन समस्याओं पर एक भी आवाज नहीं उठी। मानो गांव की सारी परेशानियां अचानक खत्म हो गई हों।

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जिम्मेदार ही बने सुनवाईकर्ता

ग्रामीणों का आरोप है कि चौपाल में वही लोग बैठे मिले जिन पर भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोप हैं।

मजदूरी रोकने वाला ही सुनवाई करने बैठ जाता है।

हैंडपंप की मरम्मत न कराने वाला सचिव ही शिकायत सुनने आता है।

कब्जा हटाने की जिम्मेदारी जिस लेखपाल को मिली, वही “न्यायाधीश” बन बैठा।

ऐसे में ग्रामीण किस भरोसे से अपनी समस्या सामने रखें? 

समाधान दिवस और चौपाल का फर्क समझिए 
तुलना साफ है। तहसील नौगढ़ में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस पर जिलाधिकारी के समक्ष 100 से ज्यादा फरियादी अपनी शिकायत लेकर आते हैं, घंटों लाइन में खड़े रहते हैं। लेकिन जिलाधिकारी के निर्देश पर आयोजित की गई चौपाल में एक भी भीड़ नहीं जुटी। यही वजह रही कि चौपाल की रिपोर्टों में सब कुछ “ठीक-ठाक” दर्ज कर लिया गया, जबकि गांवों में वास्तविकता अलग थी।

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चंदौली समाचार से जनता बोली, टूट गया है भरोसा  
“गांव में समस्याएं तो बहुत हैं, जनता चाहती है कि सुनवाई हो। लेकिन किससे कहें? प्रधान जी, लेखपाल साहब और सचिव साहब को ही सुनवाई की जिम्मेदारी मिल गई है।  ग्रामीणों का कहना है कि चौपाल अब भरोसे का मंच नहीं रहा। शिकायतें दर्ज होती हैं लेकिन उनका हल नहीं निकलता। यही वजह है कि लोग चौपाल आना-जाना बंद कर चुके हैं। अब यह सिर्फ एक औपचारिकता रह गई है—एक कागजी रिपोर्ट जिसे दिखाकर कहा जा सके कि “सब कुछ ठीक-ठाक” है।

जिलाधिकारी के लिए चुनौती
अब जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग के सामने असली चुनौती यही है कि चौपाल को जनसुनवाई का मंच बनाया जाए। स्वतंत्र अधिकारी मौजूद हों। शिकायत दर्ज करने की पारदर्शी व्यवस्था हो। हर शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई और फॉलोअप सुनिश्चित किया जाए। जब तक यह नहीं होता, चौपाल महज़ दिखावा बनी रहेगी और जनता की आवाज़ दबकर रह जाएगी।

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