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चंदौली सांसद वीरेंद्र सिंह बोले-श्रीराम फासिस्ट नहीं समाजवादी, भगवान राम पर बयान से सियासत गरमाई

चंदौली सांसद वीरेंद्र सिंह ने भगवान श्री राम को 'समाजवादी' बताकर नया विवाद छेड़ दिया है। चकिया में आयोजित सम्मान समारोह के दौरान उन्होंने राम जी के वनवास और दलित-आदिवासियों के साथ उनके जुड़ाव को समाजवादी विचारधारा से जोड़ते हुए बड़ा दावा किया।

 

सपा सांसद वीरेंद्र सिंह का बयान वायरल

भगवान राम को बताया पहला समाजवादी

फासिस्टवाद और समाजवाद की नई परिभाषा

आदिवासी और दलित जुड़ाव का दिया हवाला

भाजपा और विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया

चंदौली जिले से समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह अपने एक ताज़ा बयान को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। चकिया क्षेत्र में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सांसद ने भगवान श्री राम की तुलना समाजवादी विचारधारा से कर दी। उन्होंने न केवल भगवान राम को समाजवादी बताया, बल्कि उन्हें फासिस्टवादी विचारधारा के विपरीत भी खड़ा किया। यह बयान अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

BLA सम्मान समारोह में दिया बयान
जानकारी के अनुसार, चकिया स्थित एक निजी लॉन में समाजवादी पार्टी द्वारा बूथ लेवल एजेंट (BLA) सम्मान समारोह आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए सांसद वीरेंद्र सिंह ने कहा, "भगवान श्री राम फासिस्टवादी नहीं थे, बल्कि वह मूल रूप से समाजवादी थे।" उन्होंने तर्क दिया कि श्री राम का पूरा जीवन सामाजिक न्याय और समानता का उदाहरण है।

वनवास और सामाजिक न्याय का तर्क
अपने संबोधन को विस्तार देते हुए सांसद वीरेंद्र सिंह ने कहा कि भगवान राम ने अपने वनवास काल के दौरान महलों के ऐश्वर्य को त्याग कर जंगलों में आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को गले लगाया। उन्होंने शबरी के बेर खाए और केवट को मित्र बनाया। सांसद के अनुसार, समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने की यही नीति 'समाजवाद' है। उन्होंने कहा कि श्री राम का जीवन समानता और सहयोग का संदेश देता है, जो सपा की विचारधारा से पूरी तरह मेल खाता है।

विरोधियों ने साधा निशाना, बढ़ी सियासी तपिश
जैसे ही सांसद का यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हुआ, राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक आस्था का राजनीतिकरण करार दिया है। आलोचकों का कहना है कि वोट बैंक की राजनीति के लिए भगवान राम को किसी खास राजनीतिक विचारधारा के दायरे में बांधना अनुचित है। सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर दो फाड़ देखने को मिल रहे हैं; जहाँ सपा समर्थक इसे एक प्रगतिशील सोच बता रहे हैं, वहीं अन्य लोग इसे धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ मान रहे हैं।

फिलहाल, वीरेंद्र सिंह के इस बयान ने जिले की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आगामी चुनावों को देखते हुए माना जा रहा है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।

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