'आंख निकालकर चश्मा बांटने' जैसा है कंबल वितरण का शोर; मुफ्त राशन और ₹100 के कंबल के लिए लाइन
भीषण ठंड में जनप्रतिनिधियों और प्रशासन द्वारा किए जा रहे कंबल वितरण पर एक प्रबुद्ध नागरिक ने तीखा प्रहार किया है। ₹100 के कंबल के लिए फोटो खिंचवाने की होड़ और गरीबों की क्रय शक्ति को लेकर उठाए गए ये सवाल सरकार की कार्यप्रणाली को आइना दिखाते हैं।
'प्रचार की राजनीति' बनाम 'गरीबों की ठिठुरन'
कंबल वितरण में फोटो खिंचवाने की होड़
जनता की क्रय शक्ति बढ़ाने पर जोर
अस्सी करोड़ मुफ्त राशन और गरीबी का सच
बकाया मजदूरी और राजनीति का विरोधाभास
तिलक अस्पताल कार्यक्रम में शामिल होने की शर्त
वर्तमान में कड़ाके की ठंड उत्तर भारत को अपनी चपेट में लिए हुए है, लेकिन इस ठंड के साथ ही 'कंबल वितरण' की राजनीति भी गरमा गई है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस समय 'आंख निकालकर चश्मा बांटने' जैसी स्थिति बनी हुई है। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अस्सी से सौ रुपये की कीमत वाली कंबल को कई-कई हाथों से पकड़कर फोटो खिंचवाने की होड़ मची है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि अगर सरकार गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं सही ढंग से उन तक पहुँचाती, तो क्या वे आज ₹100 का कंबल खुद खरीदने के लायक न होते?
अर्थव्यवस्था का दावा और राशन की लाइन
एक ओर सरकार दावा करती है कि भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है, लेकिन दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि देश के 80 करोड़ लोग आज भी मुफ्त राशन की कतारों में खड़े हैं। जब मध्यमवर्गीय या अच्छी कमाई करने वाले परिवारों की बुजुर्ग महिलाएं ₹100 के कंबल के लिए घंटों लाइन में लगी होती हैं, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है। आलोचकों का मानना है कि सरकार को जनता की 'क्रय शक्ति' (Purchasing Power) बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए, न कि उन्हें छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए मोहताज बनाना चाहिए।
मजदूरी का बकाया और कंबल का दिखावा
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कई जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जो अपने मजदूरों की पुरानी बकाया मजदूरी का भुगतान करने में तो कतराते हैं, लेकिन ठंड के मौसम में प्रचार-प्रसार के लिए कंबल बांटते हुए फोटो खिंचवाना नहीं भूलते। हालांकि, इस बीच समाज का एक वह वर्ग भी है जो बिना किसी दिखावे और प्रचार के निःस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की सेवा कर रहा है। असल सेवा वह है जिसमें प्रचार न हो, बल्कि पीड़ित के आंसू पोंछने की सच्ची तड़प हो।
आगामी कार्यक्रम और कड़ी शर्तें
इसी वैचारिक बहस के बीच 11 जनवरी को मुगलसराय-चकिया बाईपास स्थित तिलक अस्पताल में होने वाले कंबल वितरण कार्यक्रम की चर्चा भी तेज है। इस कार्यक्रम के लिए आमंत्रित कुछ प्रबुद्ध जनों ने स्पष्ट किया है कि वे केवल तभी शामिल होंगे जब उनकी शर्तें मानी जाएंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आयोजक दिखावे की इस राजनीति से ऊपर उठकर वास्तविक सेवा की शर्तों को स्वीकार करते हैं या यह कार्यक्रम भी केवल 'फोटो सेशन' बनकर रह जाता है
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