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रुपये की गिरावट और ईंधन की महंगाई: PM मोदी ने मांगा जनता का साथ, इसलिए लगा रहे सोना और विदेश यात्रा पर लगाम

पश्चिम एशिया के संकट और 71.98 अरब डॉलर के रिकॉर्ड सोना आयात ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने और एक वर्ष तक सोना न खरीदने की भावुक अपील की है, जो सीधे आम आदमी की बचत और सुरक्षा से जुड़ी है।

 
 

पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल

भारत का सोना आयात रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर के पार

प्रधानमंत्री की अपील: ईंधन बचाएं और विदेश यात्राओं में करें कटौती

सोना खरीदने पर एक साल के लिए रोक लगाने का आह्वान

गिरते रुपये को संभालने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को जनता का सहारा

किसी राष्ट्र के जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब प्रधानमंत्री की आवाज़ केवल सत्ता की आवाज़ नहीं रह जाती, वह घर-घर की चौखट पर रखी हुई एक आर्थिक घंटी बन जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती तेल कीमतों के बीच लोगों से ईंधन बचाने, विदेश यात्रा घटाने और एक वर्ष तक सोना न खरीदने की अपील की है; रिपोर्टों के अनुसार भारत का सोना आयात 2025-26 में लगभग 71.98 अरब डॉलर तक पहुँचा और रुपया भी भारी दबाव में है। इसीलिए वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक डॉ. विनय कुमार वर्मा ने अपने नजरिए से पूरे मामले को देखा है।

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डॉ. विनय कुमार वर्मा का कहना है कि यह अपील इसलिए साधारण नहीं है, क्योंकि भारत में सोना केवल धातु नहीं है-वह बेटी के कन्यादान की चिंता है, माँ की पोटली का भरोसा है, बहू की पहली पायल है, बूढ़े पिता की छिपी हुई सुरक्षा है और गृहस्थ जीवन की वह चुप बचत है जिसे बैंक की भाषा नहीं आती, पर संकट की भाषा खूब आती है।
         
फिर भी प्रश्न बड़ा है- क्या देश की अर्थव्यवस्था बचाने का अंतिम उपाय यही है कि सामान्य आदमी पेट्रोल कम जलाए और बेटी के विवाह में सोना कम खरीदे? क्या यही अंतिम विकल्प है, या यह केवल उस लंबे आर्थिक वृक्ष की एक पत्ती है जिसकी जड़ें कहीं और अधिक गहरी हैं? प्रधानमंत्री जब बोलते हैं तो निश्चय ही उनके पीछे देश की चिंता होती है। पर देश केवल उपभोक्ता जनता का नाम नहीं है; देश सरकार भी है, उद्योग भी है, नीति भी है, बाजार भी है, चुनाव भी है, मुफ्त योजनाएँ भी हैं, आयात-निर्यात भी हैं और वह प्रशासनिक विवेक भी है जो अच्छे समय में बचत करता है ताकि कठिन समय में राष्ट्र हाथ न फैलाए।
           
 सोना न खरीदने की अपील भावुक समाज को चोट पहुँचा सकती है, क्योंकि भारत में सोना विलासिता से पहले परंपरा है। लेकिन यह भी सत्य है कि जब हर वर्ष अरबों डॉलर का सोना आयात होता है, तब विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। तेल और सोना दोनों डॉलर में खरीदे जाते हैं। तेल आवश्यक है, सोना सांस्कृतिक और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक है। पर जब दोनों मिलकर चालू खाते पर बोझ बनते हैं, तब देश के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभरती हैं। इसलिए अपील का भाव गलत नहीं कहा जा सकता, पर इसे अंतिम उपाय मान लेना भी अधूरा चिंतन होगा।
                
सवाल यह है कि सरकारें अच्छे समय में क्या करती रहीं? जब कच्चा तेल सस्ता था, तब क्या उस बचत को भविष्य की कठिनाइयों के लिए संचित किया गया? क्या तेल मूल्य से मिले राजस्व को उत्पादन, निर्यात, रोजगार और ऊर्जा आत्मनिर्भरता में पर्याप्त रूप से लगाया गया? अगर नहीं, तो आज केवल जनता से संयम माँगना न्याय का पूरा चित्र नहीं है। जनता त्याग कर सकती है, पर त्याग का नैतिक अधिकार वही सत्ता प्राप्त करती है जो स्वयं भी खर्च, दिखावा, चुनावी लाभ और मुफ्त घोषणाओं में संयम दिखाए।
          
 भारत को सोना कम खरीदने की सलाह दी जा सकती है, पर उससे भी बड़ा प्रश्न है- भारत को सोना आयात करने की जरूरत इतनी अधिक क्यों पड़ती है? क्या हमारी घरेलू बचत को सुरक्षित निवेश के नए रास्ते मिले? क्या छोटे परिवारों को ऐसा विश्वास मिला कि संकट में बैंक, बीमा, पेंशन और स्वास्थ्य सुरक्षा सोने से अधिक भरोसेमंद सिद्ध होंगे? जब आदमी को व्यवस्था पर भरोसा नहीं होता, तब वह सोना खरीदता है; जब भविष्य धुँधला दिखता है, तब वह पीली धातु को ईश्वर की छोटी मूर्ति समझकर घर में रखता है। इसलिए सोने की खरीद केवल लालच नहीं, असुरक्षा का सामाजिक मनोविज्ञान भी है।
        
देश को केवल जनता के उपभोग पर नियंत्रण से नहीं, उत्पादन की शक्ति से बचाया जाता है। अगर आयात अधिक है तो निर्यात बढ़ाना होगा। अगर डॉलर बाहर जा रहा है तो डॉलर भीतर लाने की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए कृषि-प्रसंस्करण, छोटे उद्योग, हस्तशिल्प, टेक्सटाइल, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, शिक्षा, चिकित्सा पर्यटन, आईटी सेवाएँ और भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़े वैश्विक उद्योगों को मजबूत करना होगा। केवल नारा पर्याप्त नहीं है; ‘मेक इन इंडिया’ तब सफल होगा जब छोटे निर्माता को बिजली सस्ती मिले, कर्ज सरल मिले, कर-प्रणाली सहज हो, भ्रष्टाचार कम हो और बाजार तक पहुँच मिले।
             
 मुफ्त योजनाओं पर भी ईमानदार चर्चा आवश्यक है। गरीब की सहायता और चुनावी मुफ्तखोरी में अंतर होता है। भूखे को अनाज देना करुणा है, पर सक्षम मतदाता को चुनावी लाभ के लिए मुफ्त की आदत में बाँध देना अर्थव्यवस्था की रीढ़ को कमजोर करता है।      
            
कल्याणकारी राज्य जरूरी है, पर वह उत्पादक राज्य भी होना चाहिए। जो योजना नागरिक को आत्मनिर्भर बनाती है, वह राष्ट्रधर्म है; जो उसे स्थायी निर्भरता में डालती है, वह भविष्य पर बोझ है। इसलिए देश को मुफ्त घोषणाओं की राजनीति से कौशल, रोजगार और उत्पादन की राजनीति की ओर लौटना होगा।

ईंधन बचाना आवश्यक है, पर ईंधन संकट का समाधान केवल जनता की कम यात्रा नहीं है। शहरों में मजबूत सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक बसें, सस्ती मेट्रो, सुरक्षित साइकिल पथ, स्थानीय रोजगार, वर्क फ्रॉम होम नीति, सौर ऊर्जा, जैव ईंधन, रेलवे माल ढुलाई और ऊर्जा दक्षता- ये सब वास्तविक विकल्प हैं। यदि गाँव का युवा रोज़गार के लिए महानगर जाने को विवश है, तो पेट्रोल बचाने की अपील अधूरी है। यदि शहर ऐसी रचना में बने हैं कि बिना निजी वाहन के जीवन कठिन हो, तो नागरिक को दोष देना आसान है, समाधान बनाना कठिन।
            
विदेश यात्रा पर खर्च घटाने की बात भी सही हो सकती है, पर भारत को ऐसा देश बनाना होगा जहाँ लोग घूमने, पढ़ने, इलाज कराने और अनुभव लेने के लिए बाहर जाने को मजबूर न हों। भारत में पर्यटन, उच्च शिक्षा, अस्पताल और सांस्कृतिक नगरों को ऐसा बनाया जाए कि डॉलर बाहर जाने के बजाय भीतर आए। काशी, प्रयाग, अयोध्या, उज्जैन, पुरी, मदुरै, अमृतसर, अजमेर, बोधगया और हिमालय- ये केवल तीर्थ नहीं, विश्व पर्यटन की विराट संभावनाएँ हैं। पर स्वच्छता, सुरक्षा, सुविधा और विश्वस्तरीय प्रबंधन के बिना भावनाएँ विदेशी मुद्रा में नहीं बदलतीं।
          
प्रधानमंत्री की अपील को इसलिए एक संकेत माना जाना चाहिए, समाधान नहीं। संकेत यह है कि संकट गंभीर है। समाधान यह है कि सरकार, उद्योग और जनता तीनों अपनी-अपनी भूमिका निभाएँ। जनता संयम रखे, सरकार खर्च अनुशासित करे, उद्योग उत्पादन बढ़ाए, बैंक बचत को सुरक्षित बनाएँ, नीति-निर्माता आयात घटाएँ और निर्यात बढ़ाएँ। राष्ट्र केवल आम आदमी की थाली से बचत करके नहीं बनता; वह नीति की दूरदृष्टि, शासन की सादगी और उत्पादन की आग से बनता है।
         
देश की आर्थिक स्थिति सुधारनी है तो पहला संकल्प होना चाहिए- चुनावी अर्थशास्त्र पर राष्ट्रीय अर्थशास्त्र को प्राथमिकता मिले। दूसरा संकल्प- मुफ्त योजनाओं को पारदर्शी, सीमित और जरूरतमंद केंद्रित बनाया जाए। तीसरा- ऊर्जा आत्मनिर्भरता को युद्धस्तर पर लिया जाए। चौथा- सोने के स्थान पर सुरक्षित, सरल और भरोसेमंद घरेलू निवेश विकल्प दिए जाएँ। पाँचवाँ- स्थानीय उद्योगों को सचमुच स्थानीय शक्ति बनाया जाए। छठा- सरकारी अपव्यय, दिखावटी आयोजन और अनुत्पादक खर्च पर कठोर नियंत्रण हो। सातवाँ-जनता से त्याग माँगने से पहले शासन स्वयं त्याग का उदाहरण रखे।
           
  भारत का सामान्य नागरिक देश के लिए बलिदान देने से पीछे नहीं हटता। उसने युद्ध में सोना दिया है, आपदा में दान दिया है, नोटबंदी में कतारें झेली हैं, महामारी में घरों में बंद रहना स्वीकार किया है। वह राष्ट्र से प्रेम करता है। पर वह यह भी चाहता है कि उसका त्याग अकेला न हो। वह चाहता है कि उसके एक ग्राम सोने के त्याग के साथ सत्ता भी अपने सौ ग्राम अहंकार का त्याग करे। उसके एक लीटर पेट्रोल की बचत के साथ नीति भी हजारों करोड़ के अपव्यय को रोके।
      
इसलिए सोना न खरीदना देशभक्ति हो सकता है, पेट्रोल बचाना भी देशभक्ति हो सकता है, पर सच्ची देशभक्ति केवल जनता के संयम से नहीं, शासन के विवेक से पूरी होती है। राष्ट्र का अर्थशास्त्र तब सुंदर बनता है जब माँ की पोटली, किसान की जेब, मजदूर की मजदूरी, व्यापारी की दुकान, उद्योग की मशीन और सरकार का बजट- सब एक ही नैतिक सूत्र में बँध जाएँ।
       
आज भारत के सामने प्रश्न सोने का नहीं, भरोसे का है; तेल का नहीं, दूरदृष्टि का है; डॉलर का नहीं, नीति के अनुशासन का है। यदि इस अपील से देश में गंभीर आर्थिक संवाद शुरू होता है, तो यह स्वागत योग्य है। पर यदि इसका अर्थ केवल इतना रह गया कि जनता कम खरीदे, कम चले, कम चाहे- तो यह अधूरा उपाय होगा। भारत को केवल बचत करने वाला राष्ट्र नहीं, कमाने वाला राष्ट्र बनना होगा; केवल त्याग करने वाली जनता नहीं, न्यायपूर्ण नीति वाला शासन चाहिए। तभी सोने की चमक कम होने पर भी राष्ट्र का माथा उज्ज्वल रहेगा।

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