अब हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में बनेगा 'Equal Opportunity Centre, फर्जी शिकायतों पर क्या होगा एक्शन..?
UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए 'Equal Opportunity Centre' (EOC) के गठन का आदेश दिया है। डॉ. विनय कुमार वर्मा के अनुसार, यह कदम कैंपस में जाति, लिंग और वर्ग के आधार पर होने वाली उपेक्षा को रोककर एक न्यायपूर्ण वातावरण तैयार करेगा।
कैंपस में भेदभाव निवारण का नया तंत्र
समता समिति में होंगे कुल 10 सदस्य
दो छात्र प्रतिनिधि विशेष आमंत्रित सदस्य
नागरिक समाज के विशेषज्ञों की भागीदारी
यूजीसी की समावेशी शिक्षा की पहल
उच्च शिक्षा में सुधार का नया साहस विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी हालिया अधिसूचना उच्च शिक्षा संस्थानों में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। डॉ. विनय कुमार वर्मा के विचारों के अनुसार, जब कोई व्यवस्था अपने भीतर सुधार का साहस करती है, तो वह समाज के आईने में खुद को देखती है। यूजीसी का यह नया नोटिफिकेशन कैंपस में समता, समावेशन और भेदभाव-निवारण को सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह उन आवाज़ों को मंच प्रदान करेगा जो लंबे समय से असमानता और उपेक्षा का शिकार रही हैं।

EOC और समता समिति का उद्देश्य इस अधिसूचना का प्राथमिक उद्देश्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में एक ऐसा तंत्र विकसित करना है, जहाँ किसी भी छात्र या कर्मचारी के साथ जाति, वर्ग, लिंग या दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव न हो। इसके लिए प्रत्येक संस्थान में Equal Opportunity Centre (EOC) और उसके अंतर्गत समता समिति (Equity Committee) के गठन का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को कैंपस में जीवंत करने का प्रयास है।
जब कोई व्यवस्था अपने भीतर सुधार का साहस करती है, तो वह केवल नियम नहीं बनाती- वह समाज के आईने में स्वयं को देखने का जोखिम भी उठाती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी किया गया नया नोटिफिकेशन - जो उच्च शिक्षा संस्थानों में समता, समावेशन और भेदभाव-निवारण की बात करता है- इसी साहस का परिणाम है। यह अधिसूचना एक ओर उन आवाज़ों को सुनने का प्रयास है, जो वर्षों से असमानता और उपेक्षा की पीड़ा ढोती आई हैं; तो दूसरी ओर यह उन आशंकाओं को भी जन्म देती है, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना भविष्य के लिए उचित नहीं होगा।
इस नोटिफिकेशन का मूल उद्देश्य स्पष्ट है- विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में ऐसा तंत्र विकसित करना, जहाँ जाति, वर्ग, लिंग, दिव्यांगता या किसी भी सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव की शिकायतें सुनी जाएँ, जाँची जाएँ और न्यायपूर्ण ढंग से सुलझाई जाएँ। इसी उद्देश्य से प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में Equal Opportunity Centre (EOC) तथा उसके अंतर्गत Equity Committee (समता समिति) के गठन का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था पहली नज़र में मानवीय, संवेदनशील और लोकतांत्रिक दिखती है और वास्तव में है भी।
यूजीसी की अधिसूचना के अनुसार समता समिति की संरचना स्पष्ट और निर्धारित है। समिति में कुल आठ (8) पदेन/नामित सदस्य होंगे - संस्थान प्रमुख (वाईस चांसलर /प्रिंसिपल) पदेन अध्यक्ष होंगे; तीन वरिष्ठ संकाय सदस्य (प्रोफेसर/एसोसिएट प्रोफेसर स्तर के); एक गैर-शिक्षण कर्मचारी; नागरिक समाज से दो प्रतिनिधि (जिन्हें शिक्षा,सामाजिक न्याय या प्रशासन का अनुभव हो);और EOC का समन्वयक पदेन सदस्य-सचिव होगा। इसके अतिरिक्त, दो छात्र प्रतिनिधि “विशेष आमंत्रित” के रूप में समिति की बैठकों में शामिल किए जाएँगे। वे समिति के औपचारिक सदस्य नहीं होंगे, पर उनकी भागीदारी अनिवार्य मानी गई है। इस प्रकार समिति की प्रक्रिया में कुल दस व्यक्तियों की सहभागिता सुनिश्चित की गई है।
समिति की संरचना को लेकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिला तथा दिव्यांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाएगा। हालाँकि अधिसूचना यह नहीं बताती कि प्रत्येक श्रेणी से कितने सदस्य होंगे, पर यह ज़िम्मेदारी संस्थान पर छोड़ती है कि आठ सदस्यों की संरचना में यह प्रतिनिधित्व वास्तविक और प्रभावी रूप से मौजूद रहे। यह प्रावधान भारतीय संविधान की उसी भावना से जुड़ा है, जो केवल समानता की घोषणा नहीं करता, बल्कि समान अवसर तक पहुँचने के साधन भी सुनिश्चित करता है।
यहीं से कुछ प्रश्न और भ्रम उत्पन्न होते हैं और यह कहना आवश्यक है कि प्रश्न उठना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है।
पहला भ्रम- समिति की सदस्य-संख्या को लेकर रहा है। कुछ जगह यह धारणा बनी कि समिति में 9 सदस्य होंगे, जबकि अधिसूचना स्पष्ट रूप से बताती है कि 8 सदस्य + 2 छात्र विशेष आमंत्रित होंगे। इस बिंदु पर स्पष्टता आवश्यक थी, जो नोटिफिकेशन के ध्यान से पढ़ने पर पूरी तरह स्थापित हो जाती है।
दूसरा भ्रम - ‘जनरल कैटेगरी’ के प्रतिनिधित्व को लेकर उठता है। अधिसूचना में सामान्य वर्ग के लिए अलग से अनिवार्य प्रतिनिधित्व का उल्लेख नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सामान्य वर्ग को बाहर रखा गया है। समिति के तीन वरिष्ठ संकाय सदस्य, गैर-शिक्षण कर्मचारी या नागरिक समाज के प्रतिनिधि किसी भी वर्ग से हो सकते हैं। नियम केवल यह सुनिश्चित करता है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित और कम प्रतिनिधित्व वाले वर्ग समिति में अवश्य उपस्थित हों, ताकि निर्णय-प्रक्रिया एकपक्षीय न रहे। इसे संशय के रूप में नहीं, बल्कि “संतुलन की भरपाई” के रूप में समझा जाना चाहिए।
सबसे अधिक चर्चा और विवाद- झूठी शिकायतों को लेकर है। अधिसूचना यह तो स्पष्ट करती है कि प्रत्येक शिकायत की जाँच होगी, पर यह स्पष्ट रूप से नहीं बताती कि यदि कोई शिकायत जाँच में झूठी या दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी। यह तथ्य है कि प्रारंभिक मसौदे में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था, जिसे अंतिम अधिसूचना में हटा दिया गया। समर्थकों का मत है कि दंड का भय वास्तविक पीड़ितों को शिकायत करने से रोक सकता है; वहीं आलोचकों को आशंका है कि बिना जवाबदेही के व्यवस्था का दुरुपयोग संभव है।
यह समझना आवश्यक है कि यह अधिसूचना किसी विशेष वर्ग को अतिरिक्त अधिकार देने के लिए नहीं, बल्कि भयमुक्त शिकायत-प्रणाली विकसित करने के लिए लाई गई है। परंतु भय केवल शिकायतकर्ता के मन में नहीं होता-कभी-कभी वह उस व्यक्ति के मन में भी होता है, जिस पर आरोप लगाया गया हो। यदि दोनों पक्षों की मनोवैज्ञानिक और प्रक्रियागत सुरक्षा का संतुलन न बना, तो न्याय के स्थान पर अविश्वास और तनाव का वातावरण बन सकता है।
एक और भ्रम- यह भी है कि यह नई व्यवस्था पहले से मौजूद SC/ST Cells, Grievance Redressal Committees और ICC से कैसे जुड़ती है। क्या यह दोहराव है या एकीकरण? अधिसूचना का संकेत एक व्यापक, समन्वित ढाँचे की ओर है, पर संस्थानों के लिए यह आवश्यक है कि यूजीसी भविष्य में स्पष्ट एसओपी(SOP) जारी करे, जिससे विभिन्न समितियों के अधिकार-क्षेत्र में टकराव न हो।
निष्पक्ष दृष्टि से यह स्वीकार करना होगा कि उच्च शिक्षा परिसरों में भेदभाव की घटनाएँ काल्पनिक नहीं हैं। अनेक रिपोर्टें, व्यक्तिगत अनुभव और न्यायिक टिप्पणियाँ इस सच्चाई की पुष्टि करती हैं। ऐसे में यदि यह अधिसूचना उन अदृश्य दीवारों को गिराने का प्रयास है, तो उसे केवल आशंका की दृष्टि से देखना भी अनुचित होगा।
पर जनहित केवल एक पक्ष की सुरक्षा से नहीं बनता- वह संतुलन से बनता है। इसलिए सुझाव के रूप में यह कहा जा सकता है कि - यूजीसी को झूठी शिकायत और दुर्भावनापूर्ण शिकायत के बीच स्पष्ट अंतर की प्रक्रिया बतानी चाहिए। दंडात्मक भाषा से बचते हुए भी यह स्पष्ट किया जा सकता है कि जानबूझकर की गई झूठी शिकायतें संस्थान के सामान्य अनुशासन नियमों अथवा प्रचलित कानूनों के अंतर्गत विचारणीय होंगी। इससे न तो वास्तविक पीड़ित डरेगा, न ही किसी निर्दोष व्यक्ति को असहाय महसूस करना पड़ेगा।
इसी प्रकार, समिति के सदस्यों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यशालाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिएँ, क्योंकि न्याय केवल नियमों से नहीं, दृष्टि से होता है। जाँच-प्रक्रिया समयबद्ध, गोपनीय और दस्तावेज़-आधारित हो- सोशल मीडिया या मौखिक दबावों से मुक्त- यह विश्वास दोनों पक्षों के लिए अनिवार्य है।
यह भी ध्यान रखने योग्य है कि यूजीसी ने इन प्रावधानों के अनुपालन न होने पर संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का अधिकार अपने पास रखा है- जिसमें यूजीसी योजनाओं से वंचित करना, नए कार्यक्रमों पर रोक, और यहाँ तक कि मान्यता से संबंधित कदम भी शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि यह अधिसूचना केवल परामर्श नहीं, बल्कि लागू करने योग्य व्यवस्था है।
यह अधिसूचना न किसी एक वर्ग की जीत है, न किसी दूसरे की हार। यह एक संवैधानिक प्रयोग है- समता को कैंपस के जीवन में उतारने का। प्रयोगों में संवाद होता है, संशोधन होते हैं, और समय के साथ परिपक्वता आती है।
यदि हम इसे केवल समर्थन या विरोध के खाँचों में बाँट देंगे, तो इसका उद्देश्य खो जाएगा और यदि हम इसे साझा उत्तरदायित्व के रूप में देखेंगे, तो संभव है कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के केंद्र ही नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के भी केंद्र बन सकें।
समता का अर्थ विशेषाधिकार नहीं होता और निष्पक्षता का अर्थ उदासीनता नहीं। इन दोनों के बीच का संतुलन ही इस अधिसूचना की वास्तविक कसौटी है और यही वह बिंदु है, जहाँ यूजीसी, संस्थान, शिक्षक और छात्र- सभी को मिलकर आगे बढ़ना होगा। यदि कहीं कुछ छूट गया हो, तो पुनः मंथन कर उसे दुरुस्त करना ही इस पहल की सच्ची सफलता होगी।
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