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सकलडीहा तहसील के गतिरोध में लोगों को याद आ रहे 'पांडेयजी' व 'मीणाजी', जानिए क्यों व कैसे
आखिर चंदौली के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि आखिर क्यों सकलडीहा तहसील में यह गतिरोध चल रहा है और इसके पीछे क्या मुख्य वजह है और क्यों अधिकारी व राजनेता इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं...
 

39 दिनों से चल रहे गतिरोध का भविष्य

कब व कैसे होगा अंत

कौन करेगा पहल और कौन झुकेगा

कौन किसको मनाएगा और किसको समझाएगा

चंदौली जिले की सकलडीहा तहसील में तहसीलदार वंदना मिश्रा को लेकर अधिवक्ताओं का विरोध प्रदर्शन जारी है। लगभग 39 दिनों का समय बीत जाने के बाद भी इस मुद्दे को लेकर ना तो जिला प्रशासन सक्रिय हुआ और न ही जिले का कोई माननीय जनप्रतिनिधि इस गतिरोध को दूर करने में पहल कर सका। ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है कि सकलडीहा तहसील के लोग भाजपा सरकार व भाजपा के जनप्रतिनिधियों की वरीयता में नहीं हैं और न ही यहां के लोगों के सुखदुख से किसी का कुछ लेना देना है। तभी तो भाजपा के कुछ नेता इसे 'सपा समर्थित वकीलों का विरोध प्रदर्शन' समझकर उपेक्षित कर रहे हैं तो कुछ लोग 'ब्राह्मण अधिकारी के विरोध की राजनीति' समझ कर अपना पल्ला झाड़ ले रहे हैं। आखिर चंदौली के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि आखिर क्यों सकलडीहा तहसील में यह गतिरोध चल रहा है और इसके पीछे क्या मुख्य वजह है और क्यों अधिकारी व राजनेता इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं...

वंदना मिश्रा की दोबारा पोस्टिंग के विरोध का असली कारण  
सकलडीहा तहलीस के अधिवक्ताओं की जिद और अधिकारियों के उपेक्षित रवैए की वजह से आम जनता पिस रही है। 39 दिनों से चल रहा यह आंदोलन किसी और के सेहत पर कोई असर नहीं डाल रहा है, लेकिन इससे चंदौली जिले की सकलडीहा तहसील की रहने वाली वह गरीब जनता जरूर प्रभावित हो रही है, जो सांसद-विधायक, डीएम-एसडीएम या अन्य छोटे बड़े लोगों तक अपनी सीधी पकड़ नहीं रखती है। वह अपने वकील साहब को दस-बीस-पचास देकर अपना काम करा लेती है। इसी कारण से अधिवक्ता जिले की सबसे बड़ी तहसील में ऐसे अधिकारी की पोस्टिंग चाहते हैं, जिसके यहां फाइलें जानबूझकर किसी खास कारण की वजह से न लटकायीं जाएं। वह पिछले तहसीलदार की तरह की कार्यशैली वाला अधिकारी चाहते हैं। जहां फाइलें न तो किसी खास भावना से रोकी जाती थीं और न ही जररुत से ज्यादा की अपेक्षा रखी जाती थी। लेकिन वंदना मिश्रा को संभवतः लोग इस कार्यशैली का नहीं मान रहे हैं। अब क्या सच्चाई यह तो अधिवक्ता व तहसील प्रशासन और अच्छी तरह से जानता होगा।

एक दूसरे के हितों का ध्यान रखने का मामला
 कहा जाता है कि तहसील स्तर के अधिवक्ताओं के माध्यम से फरियादी अपने छोटे मोटे काम करवाने में मदद लेते हैं और अधिवक्ता भी अपनी फीस लेकर अफसरों के कार्यालयों के चक्कर लगाकर औऱ लटकी हुयी फाइल का हालचाल पता करके अपने मुअक्किल की मुश्किल दूर करते रहते हैं। कुछ वकील अधिकारियों के साथ मिल बैठकर बातचीत करते हुए भी अपना करा लिया करते हैं। इस दौरान दोनों यह दूसरे के हितों के साथ साथ पद व कद की गरिमा का भी ध्यान रखते हैं। लेकिन यह मामला फिर से सकलडीहा तहसील में तैनात की गई वंदना मिश्रा के साथ नहीं बैठ रहा है। इसके पीछे अलग-अलग तरह की दलीलें दी जा रही हैं। ऐसी दलीलों की सच्चाई अधिकारी व राजनेता मातहतों व तहसील के कर्मचारियों और अधिवक्ताओं से मिलकर खुद समझ सकते हैं या इसका पता लगा सकते हैं। मामला पद प्रतिष्ठा के साथ-साथ अर्थ से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इस पर हमारी ओर से टिप्पणी करना उचित नहीं है।

केवल सपा समर्थित नहीं है विरोध
भाजपा के कुछ नेता व कार्यकर्ता इसे सपा समर्थित वकीलों का विरोध बताकर प्रशासन व भाजपा के जनप्रतिनिधियों को मामले से दूरी बनाए रखने की गलत बात समझा रहे हैं। यह तहसील के दोनों बार एसोसिएशन के लोगों के द्वारा किया जा रहा है, जिसमें सारे दलों के समर्थक वकील शामिल हैं। हालांकि कि कुछ वकील बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अफसरों की जिद और भाजपा नेताओं का दबाव इसमें आड़े आ रहा है।

एक विकल्प ऐसा है
 अधिवक्ताओं का कहना है कि वंदना मिश्रा की तैनाती से किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें तहसीलदार के पद से हटा दिया जाना चाहिए। इसके बदले किसी और को इसका चार्ज दिया जाना चाहिए। इसके पीछे एक अधिवक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वंदना मिश्रा के हटाए जाने के बाद सतीश कुमार ने जिस तरह से सकलडीहा तहसील में काम किया, उससे अधिवक्ता और जनता को काफी राहत मिली थी। वह उसी कार्यशैली के अधिकारी को चाहते हैं। एक बार फिर से उसी कुर्सी पर वंदना मिश्रा के आ जाने के बाद अधिवक्ता और जनता की वह राहत खत्म हो जाएगी क्योंकि उनकी कार्यशैली से हर कोई भलीभांति परिचित रहा है। 

 अधिवक्ताओं का कहना है कि वंदना मिश्रा को जिला प्रशासन न्यायिक कार्यो में इस्तेमाल करें, इसका उनसे कोई विरोध नहीं है। लेकिन अन्य कार्यों में उनकी कार्यशैली ना तो स्वीकार्य है और ना ही जनता के हित में है। अधिवक्ताओं का यह भी कहना है कि जब दो अलग-अलग पद यहां पर सृजित है तो एक ही व्यक्ति को दोनों पदों का चार्ज देना कहीं से भी न्यायोचित कार्य नहीं है। जिला प्रशासन को किसी और तहसीलदार को यह चार्ज देना चाहिए। जिला प्रशासन की जिद्द भी जनहित में नहीं है। आखिर डीएम साहिबा को यह बताना होगा कि आखिर कौन सी मजबूरी या किस राजनेता के दबाव में वह वंदना मिश्रा को दोबारा यहां तैनात किया है। कौन राजनेता है जिसके स्टाफ के लोग इनकी पैरवी कर रहे हैं।

जिद छोड़ने को कोई तैयार नहीं
 अधिवक्ताओं का एक वर्ग यह भी चाहता है कि इस मुद्दे का कोई समाधान निकले और अधिवक्ता के साथ जिला प्रशासन की मध्यस्थता के लिए कोई जनप्रतिनिधि या राजनेता सामने आए, ताकि जनता को दोनों की जिद से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके। एक ओर अधिवक्ता अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और जिला प्रशासन सिर्फ इसलिए अधिवक्ताओं की बात नहीं मान रहा है कि अगर एक बार झुक गए और किसी अफसर को हटा दिया तो यह काम बार बार करना पड़ेगा। एक अधिवक्ता ने कहा कि डीएम साहिबा राजातालाब की ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के रुप में काम करते हुए ऐसे गतिरोध का सामना कर चुकी हैं। इसलिए वह इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही हैं।

जिला प्रशासन के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अगर एक बार अधिवक्ताओं की जिद मान ली जाएगी तो बार-बार यह धरने प्रदर्शन होते रहेंगे और बार-बार अधिकारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना पड़ेगा। ऐसी जिद से आम जनता का काम प्रभावित हो रहा है। यह सोचना किसका काम है बेचारी निरीह जनता ना तो अपनी फरियाद जनप्रतिनिधियों से कर पा रही है और ना ही अधिकारी उसकी फरियाद सुन रहे हैं।

सांसद पर भी उठ रहे सवाल
 कुछ लो कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस पूरे मामले में चंदौली जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले कैबिनेट मंत्री व सांसद महेंद्र नाथ पांडेय की भी चुप्पी बहुत कुछ कहती है। एक ईमानदार छवि के नेता की पहचान बनाने वाले सांसद जी को इस मामले में दखल न देना जरूर चिंता का विषय है। ऐसा लग रहा है या तो डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडेय चंदौली जिले की सकलडीहा तहसील के लोगों से कोई हमदर्दी नहीं है या फिर यहां के लोगों को वह अपना वोटर नहीं मानते हैं। या चंदौली जिले की इस समस्या को अभी तक उनके खासमखास कहे जाने वाले मुखबिर टाइप के नेताओं ने नहीं पहुंचाई है। यह मुखबिर नेता अगर सांसद जी से इस मामले में पैरवी करते और डॉ महेंद्र नाथ पांडेय के संज्ञान में सकलडीहा तहसील में 1 महीने से अधिक समय तक चल रहे गतिरोध को संज्ञान में लाते तो जरुर इसका हल निकल जाता। पांडेय जी की इस मामले में दिलचस्पी न होना चिंता का विषय है। ऐसा करके या तो वह तहसीलदार का समर्थन कर रहे हैं या फिर उनको सकलडीहा तहसील से भाजपा को मिले कम वोटों का बदला लेने का सही मौका मिल गया है। 

प्रेम प्रकाश मीणा की आ रही है याद
इस मामले पर एक अधिवक्ता ने इस बात की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि सकलडीहा तहसील के लोगों को आज एक बार फिर से ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा की याद आ रही है। अगर प्रेम प्रकाश मीणा जैसा अधिकारी सकलडीहा तहसील में एसडीएम होता तो यह हाल नहीं होता और यह हड़ताल भी इतनी लंबी नहीं चलती। अगर अधिकारी गलत होता तो  वह उसको सबक सिखा गए होते और अगर अधिवक्ता बेवजह जिद कर रहे होते तो उन्हें झुकने के लिए मजबूर होना पड़ता है। प्रेम प्रकाश मीणा ने अपनी कार्यशैली से अपनी तैनाती के दौरान कई तहसीलों में ऐसा करने पर मजबूर किया। जिले की चकिया में आंदोलन कर रहे अधिवक्ताओं को भी यह बात अच्छे तरीके से पता है। जिद किसी समस्या का समाधान नहीं है। 

 इसलिए लोगों का कहना है कि डॉ महेंद्र नाथ पांडेय को यह बात समझनी चाहिए और और विकास पुरुष बनने की लालसा है तो सकलडीहा तहसील के लोगों की भावनाओं व समस्याओं को जल्द से जल्द समझते हुए इस मामले में पहल करनी चाहिए और तहसील में चल रही हड़ताल व विरोध प्रदर्शन को खत्म कराने में अपनी भूमिका का उदाहरण पेश करना चाहिए।

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