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चंदौली में विकास के नाम पर छिन रही किसानों की उपजाऊ जमीन, गोरखपुर की तर्ज पर साहूपुरी फैक्ट्री क्यों नहीं हो रही चालू

चंदौली में भारतमाला और ग्रीन फील्ड जैसी सड़कों के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन ली जा रही है। वहीं दूसरी तरफ, 416 एकड़ में फैली ऐतिहासिक साहूपुरी फैक्ट्री सालों से बंद है और अब सिर्फ कोयला डंप करने का जरिया बनकर रह गई है।

 
 

साहूपुरी फैक्ट्री बनी कोयले का गोदाम

एक्सप्रेस-वे के नाम पर जमीन अधिग्रहण

गोरखपुर की तर्ज पर विकास की मांग

Skill India के दावों पर उठे सवाल

जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली से जनता निराश

 चंदौली जिले में मानसून की पहली फुहारें पड़ चुकी हैं। मौसम तो बड़ा सुहावना हो गया है, लेकिन इसी ठंडी हवा के बीच यहाँ के किसानों, नौजवानों और आम लोगों के दिलों में तीखे सवालों का एक नया सैलाब उमड़ पड़ा है। टीवी और अखबारों में विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों, चमचमाती सड़कों और 'साइनिंग इंडिया' जैसे चमकीले नारों की भरमार है। चंदौली के पूर्व सांसद व सपा नेता रामकिशुन यादव ने चंदौली समाचार के साथ खास इंटरव्यू में भाजपा के बड़े नेताओं और सरकार से जनहित के मुद्दे पर जोर डालने का दावा करने वाले नेताओं से सवाल दागा है और कहा है कि जिले के किसानों की जमीन कभी सरकारी कार्यालय, कभी सड़क तो कभी फैक्ट्री के नाम पर छीनी जा रही है। क्या यही कृषि प्रधान चंदौली जिले के किसानों की आय दोगुनी करने का तरीका है। 

सपा नेता रामकिशुन यादव ने दावा किया कि जब आप चंदौली की जमीनी हकीकत को करीब से देखेंगे, तो यहाँ की कहानी कुछ और ही दर्द बयां करती है। आज चंदौली का सीधा-साधा किसान अपनी सबसे कीमती चीज, यानी अपनी उपजाऊ जमीन को खोने के डर में जी रहा है। वहीं दूसरी तरफ, जो फैक्ट्रियां कभी इस जिले की औद्योगिक पहचान हुआ करती थीं, वे आज सिर्फ कोयला रखने के बड़े-बड़े गोदाम बनकर रह गई हैं।

सड़कों का जाल बिछ रहा है या किसानों के लिए जंजाल बन रहा है?
चंदौली को पूरे प्रदेश में बड़े चाव से 'धान का कटोरा' कहा जाता है। यहाँ की मिट्टी सोना उगलती है, लेकिन आज इसी कटोरे में खेती का रकबा लगातार छोटा होता जा रहा है। भारतमाला प्रोजेक्ट हो, बड़े-बड़े एक्सप्रेस-वे हों या फिर गाजीपुर-महाराजगंज से जिगना होते हुए धरोली तक जाने वाली नई ग्रीन फील्ड सड़क का नक्शा—इन सब के नाम पर किसानों की सबसे कीमती और उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण (कब्जा) किया जा रहा है।

यहाँ के स्थानीय किसानों का साफ कहना है कि उनके पास पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस खेती के अलावा रोजी-रोटी कमाने का कोई दूसरा जरिया ही नहीं है। सरकार देश भर में सड़कों का शानदार जाल तो बिछा रही है, लेकिन उन अन्नदाताओं के भविष्य का क्या होगा जिनकी हरी-भरी फसलें इन पक्की सड़कों के नीचे हमेशा-हमेशा के लिए दफन हो जाएंगी? लोग पूछ रहे हैं कि सरकार की 'स्किल इंडिया' जैसी बड़ी योजनाएं यहाँ धरातल पर कहाँ हैं? अगर आप किसान से उसकी जमीन ले रहे हैं, तो उसे रोजगार का क्या पक्का विकल्प दे रहे हैं, इसका किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है।

साहूपुरी फैक्ट्री की 416 एकड़ जमीन और 50 साल का लंबा सन्नाटा
चंदौली की औद्योगिक बर्बादी का सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत देखना हो, तो साहूपुरी की फैक्ट्री में जाकर देखा जा सकता है। लगभग 416 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैली यह औद्योगिक इकाई पिछले कई दशकों से पूरी तरह ठप पड़ी है। जानकारों की मानें तो साल 1974 के आसपास से ही इस फैक्ट्री की धड़कनें बंद हो गई थीं।

सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि जब भी जिले में नए उद्योग लगाने की बात होती है, तो सरकार और बड़े अधिकारी अक्सर जमीन न होने का रोना रोते हैं। लेकिन साहूपुरी में जो 416 एकड़ की इतनी बड़ी सरकारी जमीन पहले से मौजूद है, उस पर कोई नया उद्योग शुरू करने के बजाय उसका व्यावसायिक दुरुपयोग किया जा रहा है। आज उस पवित्र औद्योगिक परिसर में बड़े-बड़े प्राइवेट गोदाम बना दिए गए हैं। इन गोदामों को भारी-भरकम किराए पर देकर वहाँ धड़ल्ले से कोयला डंप करवाया जा रहा है। यहाँ के रहने वाले युवाओं का यह सवाल बिल्कुल सही है कि अगर इस जमीन पर फिर से कोई नई फैक्ट्री चालू हो जाए, तो हमारे घर के बच्चों को नौकरी के लिए दूसरे बड़े शहरों में जाकर दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ेंगी।

गोरखपुर की तर्ज पर चंदौली का कायाकल्प क्यों नहीं हो सकता?
इस पूरे गंभीर मुद्दे पर जिले में राजनीति भी खूब चमकाई जाती है। जब भी साहूपुरी का सवाल जनता के बीच उठता है, तो मौजूदा सरकार के नेता तुरंत सारा दोष पुरानी सरकारों के माथे मढ़कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। उनका तर्क होता है कि यह फैक्ट्री कांग्रेस के जमाने में बंद हुई थी। लेकिन देश और प्रदेश की जनता अब जागरूक हो चुकी है, वह सीधा और साफ सवाल पूछ रही है।

जनता का कहना है कि जब गोरखपुर में सालों से बंद पड़े खाद कारखाने को मौजूदा योगी सरकार अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर दोबारा शुरू करवा सकती है, तो फिर चंदौली की इस साहूपुरी फैक्ट्री के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? यह वही फैक्ट्री है जो कभी खेतों की जान कही जाने वाली 'चांद छाप' यूरिया बनाती थी। क्या चंदौली का विकास सिर्फ कागजी फाइलों, बड़े-बड़े होर्डिंग्स और चुनावी मंचों से दिए जाने वाले जोशीले भाषणों तक ही सिमट कर रह गया है?

नेताओं की चमचमाती तस्वीरें और जमीनी हकीकत का बड़ा अंतर
साहूपुरी फैक्ट्री के इस पूरे विवाद में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर जनता के भीतर गहरी निराशा और भारी गुस्सा देखने को मिल रहा है। जो नेता आए दिन दिल्ली और लखनऊ में देश के बड़े-बड़े वीआईपी मंत्रियों के साथ अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं, वे संसद या विधानसभा में चंदौली की इस आवाज को मजबूती से उठाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह मामला कभी उठा नहीं, लोकसभा तक में इसकी गूंज सुनाई दी थी, लेकिन जमीन पर नतीजा आज भी बिल्कुल शून्य रहा।

करोड़ों रुपये की यह बहुमूल्य सरकारी जमीन आज उद्योग के जरिए रोजगार देने के बजाय सिर्फ काले कोयले के काले ढेर में तब्दील हो रही है। हालांकि, इस जमीन का एक छोटा सा हिस्सा बिजली सबस्टेशन और एनडीआरएफ (NDRF) के कैंप के लिए जरूर दे दिया गया है, लेकिन जो मुख्य औद्योगिक प्लांट था, वह आज भी भूतिया खंडहर की तरह खड़ा प्रशासन के मौन पर सवाल उठा रहा है। कुल मिलाकर, साहूपुरी फैक्ट्री आज हमारे नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है।

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