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चंद्रप्रभा सेंचुरी जैसे इलाकों में नहीं आते हैं राज्य पक्षी सारस, DFO बोले- पहाड़ों में नहीं रहते सारस

चंदौली की चंद्रप्रभा सेंचुरी में हुई वन्यजीव गणना के दौरान सारस पक्षियों का नाम न होने पर विवाद गहरा गया है। डीएफओ के "पहाड़ों में सारस नहीं रहते" वाले बयान को पर्यावरण प्रेमियों ने अधूरा निष्कर्ष बताया है।

 
 

76 हजार हेक्टेयर में फैली सेंचुरी से सारस पक्षी गायब

डीएफओ बी शिवशंकर के बयान के बाद छिड़ी नई बहस

पर्यावरण प्रेमियों ने घाटियों और जलस्रोतों का दिया हवाला

उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी के संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

स्थानीय लोगों ने की वैज्ञानिक गणना और रिपोर्ट की मांग

चंदौली जिले की पहचान और उत्तर प्रदेश की शान मानी जाने वाली 76 हजार हेक्टेयर में फैली चंद्रप्रभा वन्यजीव सेंचुरी (Chandraprabha Wildlife Sanctuary) में हाल ही में कराई गई वन्यजीव गणना के नतीजे चर्चा और विवादों के केंद्र में हैं। इस गणना के दौरान एक भी सारस पक्षी का दर्ज न होना संरक्षण कार्यों पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। चंदौली समाचार द्वारा इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद वन विभाग की ओर से आई प्रतिक्रिया ने इस बहस को और हवा दे दी है।

डीएफओ का बयान पर पर्यावरणविदों की आपत्ति
भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी एवं डीएफओ बी शिवशंकर ने इस संबंध में प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि सारस पक्षी पहाड़ी क्षेत्रों में नहीं रहते हैं। हालांकि, उनका यह तर्क पर्यावरण प्रेमियों और विशेषज्ञों के गले नहीं उतर रहा है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि चंद्रप्रभा सेंचुरी केवल ऊँचे पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं है। इसमें विस्तृत घाटियां, निचले मैदानी क्षेत्र, दर्जनों जलस्रोत और आसपास के कृषि क्षेत्र भी शामिल हैं। ये सभी भौगोलिक स्थितियां सारस के लिए अनुकूल आवास मानी जाती हैं। स्थानीय ग्रामीणों का तो यहाँ तक दावा है कि पूर्व वर्षों में इन क्षेत्रों में सारस बहुतायत में देखे जाते थे, लेकिन अब वे पूरी तरह गायब हो चुके हैं।

सारस का स्वभाव और पर्यावास: क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, सारस पक्षी (Saras Crane) मुख्य रूप से मीठे पानी के आर्द्रभूमि, दलदलों, झीलों और धान के खेतों में पाए जाते हैं। भारत में उत्तर प्रदेश इनका सबसे प्रमुख गढ़ है, जहाँ इसे 'राज्य पक्षी' का दर्जा प्राप्त है। सारस इंसानों के करीब और उथले पानी के स्रोतों के पास रहना पसंद करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी संरक्षित क्षेत्र में यदि कोई प्रजाति गणना में नहीं मिलती, तो उसका कारण केवल यह कह देना कि 'यहाँ वे रहते ही नहीं' एक अधूरा निष्कर्ष है। इसके पीछे आवास परिवर्तन, जलस्रोतों का सूखना, मानवीय अतिक्रमण या फिर निगरानी में भारी चूक जैसे कारण हो सकते हैं।

संरक्षण व्यवस्था पर गहराते सवाल
अगर विभाग यह मानता है कि यहाँ सारस नहीं रहते, तो सवाल उठता है कि क्या पिछले वर्षों में कभी उनकी स्वतंत्र गणना कराई गई? यदि सारस यहाँ कभी थे ही नहीं, तो उनके संरक्षण के नाम पर किए जाने वाले दावों की हकीकत क्या है? सारस को IUCN की रेड लिस्ट में 'संकटग्रस्त' (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है। आवास का नुकसान इनके लिए सबसे बड़ा खतरा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सेंचुरी के भीतर जलस्रोतों और निचले मैदानी इलाकों को सही ढंग से संरक्षित किया गया होता, तो सारस की उपस्थिति वहां अवश्य मिलती।

स्थानीय लोगों की मांग: पारदर्शी वैज्ञानिक सर्वे हो
डीएफओ के बयान के बाद स्थानीय निवासियों और वन्यजीव प्रेमियों में असंतोष है। लोगों ने मांग की है कि चंद्रप्रभा सेंचुरी में सारस समेत अन्य दुर्लभ पक्षियों की एक अलग से वैज्ञानिक गणना (Scientific Census) कराई जानी चाहिए। साथ ही, उस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में यहाँ कौन-कौन सी प्रजातियां मौजूद हैं। जनता का मानना है कि संरक्षण व्यवस्था में कहाँ चूक हुई है, इसकी पहचान तभी हो सकेगी जब विभाग अपने आंकड़ों में पारदर्शिता लाएगा। केवल भौगोलिक स्थितियों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेना लुप्त होती प्रजातियों के भविष्य के लिए घातक हो सकता है।

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