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तहसील या तमाशा: 10 साल बाद भी नौगढ़ में न रिकॉर्ड रूम, न कोर्ट..न्याय के लिए काटने पड़ रहे 40 KM के चक्कर

नौगढ़ को तहसील बने 10 साल हो गए, लेकिन आज भी एक लाख की आबादी न्याय के लिए 40 किलोमीटर दूर चकिया दौड़ने को मजबूर है। न मुंसिफ कोर्ट है और न रिकॉर्ड रूम, बस लगा है तो एक सरकारी बोर्ड।
 

नौगढ़ तहसील में 10 साल बाद भी अधूरी सुविधाएं

न्याय पाने के लिए चकिया की धूल फांकती जनता

पट्टाधारकों को नहीं मिल पा रहा जमीन पर कब्जा

रिकॉर्ड रूम और मुंसिफ कोर्ट की उठ रही मांग

बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे नौगढ़ के लोग

सिर्फ बोर्ड टांग कर भूल गई सरकार! नौगढ़ में न रिकॉर्ड रूम, न कोर्ट... पट्टाधारक दर-दर भटकने को मजबूर, 10 साल पहले फीता कटा, लेकिन हकीकत में मिला सिर्फ एक बोर्ड


अखिलेश यादव की सरकार के समय नौगढ़ को तहसील बनाने की घोषणा हुई थी। नेताओं ने फीता काटा, बड़ी-बड़ी तस्वीरें खिंचवाईं और विकास के लंबे-चौड़े दावे किए गए। लेकिन आज 10 साल बीत जाने के बाद भी नौगढ़ की तस्वीर नहीं बदली। आज एक लाख से ज्यादा की आबादी पूछ रही है कि क्या सरकार ने उन्हें सच में तहसील दी थी या सिर्फ दीवारों पर टांगने के लिए एक सरकारी बोर्ड?

'सुनवाई नौगढ़ में और फाइल चकिया में'—यह कैसा सुशासन?
नौगढ़ तहसील की हकीकत यह है कि यहाँ एसडीएम कोर्ट की कार्यवाही तो चलती है, लेकिन मामले से जुड़े जरूरी सरकारी दस्तावेज और रिकॉर्ड रूम 36 से 40 किलोमीटर दूर चकिया में रखे हैं। यानी फरियादी नौगढ़ में चक्कर काटे और कागज देखने के लिए चकिया जाए। गरीब मजदूर अपनी दिहाड़ी छोड़कर, किराया भाड़ा खर्च कर पूरा दिन बर्बाद करता है। क्या यही है असल व्यवस्था?

पट्टा सरकार का, लेकिन जमीन पर कब्जा दबंगों का!
नौगढ़ के गोलाबाद, बैरगाढ़, तेंदुआ, बाघी, लौवारी कला और बसौली जैसे कई गांवों में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों को लेकर लोगों में भारी गुस्सा है। बुजुर्ग और गरीब पट्टाधारक हाथ में सरकारी कागज लेकर दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन जमीन पर कब्जा दबंगों का ही है। कागजों में तो पट्टा मिल गया, लेकिन प्रशासन उन्हें उनका हक नहीं दिला पा रहा है।

साहब बैठे हैं एसी में, फरियादी भटक रहे धूप में
तहसील के चक्कर काटते-काटते फरियादियों के महीने गुजर जाते हैं। हर बार सिर्फ जांच और कार्रवाई का झूठा आश्वासन मिलता है, लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं बदलता। अधिकारी एसी कमरों में बैठकर सिर्फ फाइलें देखते हैं और आम जनता धूप में अपने हक के लिए गिड़गिड़ाती रहती है।

8 स्कूलों में शौचालय तक नहीं, विकास के दावों की खुली पोल
नौगढ़ का दर्द सिर्फ तहसील तक सीमित नहीं है। क्षेत्र के कम से कम 8 प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में आज तक बच्चों के लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा तक नहीं बन पाई है। जहां छोटे-छोटे बच्चे मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसें और आम आदमी को न्याय पाने के लिए 40 किलोमीटर का चक्कर काटना पड़े, वहां तरक्की के सारे दावे पूरी तरह खोखले साबित होते हैं।

अब नौगढ़ की जनता को वादे नहीं, सीधा जवाब चाहिए
दस साल से जनता सिर्फ सरकारी बोर्ड देखकर खुद को बहला रही है। लेकिन अब सब्र का बांध टूट रहा है। जनता अब शासन-प्रशासन से सीधे सवाल पूछ रही है—

क्या नौगढ़ को पूरी सुविधाओं वाली तहसील बनाने की कोई डेडलाइन है?

यहाँ रिकॉर्ड रूम, मुंसिफ कोर्ट, ग्राम न्यायालय और चकबंदी अदालत कब खुलेगी?

गांव सभा की जमीनों पर गरीब पट्टाधारकों को उनका असली अधिकार कब मिलेगा?
नौगढ़ के लोग अब किसी खोखले वादे के झांसे में नहीं आने वाले, उन्हें धरातल पर ठोस व्यवस्था चाहिए।

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