UP Panchayat Chunav: क्या है सुप्रीम कोर्ट का 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूला, जिसके बिना यूपी में नहीं होंगे पंचायत चुनाव?
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तस्वीर साफ हो गई है। कैबिनेट द्वारा समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के बाद अब चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद ही संभव हो सकेंगे, क्योंकि ट्रिपल टेस्ट और आरक्षण निर्धारण में 9 महीने से अधिक का समय लगेगा। पूरी खबर पढ़ें।
यूपी पंचायत चुनाव टलने के संकेत
समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन
सुप्रीम कोर्ट का सख्त ट्रिपल टेस्ट
जून में होगी आयोग की नियुक्तियां
विधानसभा चुनाव के बाद होंगे मतदान
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर चल रही अनिश्चितताओं के बीच राज्य कैबिनेट ने एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। कैबिनेट द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए 'समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग' (Dedicated OBC Commission) के गठन की आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है। सरकार के इस बड़े फैसले के साथ ही प्रदेश में आगामी पंचायत चुनाव की धुंधली तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो गई है। प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव तय समय पर न होकर अब काफी आगे बढ़ेंगे। जानकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई व्यवस्थाओं को धरातल पर उतारने में लगने वाले समय के कारण अब पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकेंगे।
आयोग की सिफारिशें और आरक्षण प्रक्रिया में लगेगा लंबा वक्त
कैबिनेट के इस ताजा फैसले के बाद अब त्रिस्तरीय पंचायतों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण को नए सिरे से निर्धारित किया जाएगा। इस पूरी कवायद के तहत सबसे पहले नवगठित समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग जमीनी स्तर पर जाकर सामाजिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का व्यापक अध्ययन करेगा। आयोग द्वारा अपनी विस्तृत सिफारिशें और रिपोर्ट सरकार को सौंपने, उसके आधार पर त्रिस्तरीय पंचायतों की सीटों का चक्रानुक्रम आरक्षण (Rotation Reservation) नए सिरे से तय करने और अंत में राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से चुनाव संपन्न कराने की पूरी प्रक्रिया में कम से कम नौ महीने से अधिक का लंबा समय लगने का अनुमान है।

विधानसभा चुनाव के बाद ही अब क्यों संभव हैं पंचायत चुनाव?
प्रशासनिक सूत्रों और चुनावी कैलेंडर के मुताबिक, जब तक पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा और सीटों के पुनर्गठन तथा आरक्षण की जटिल कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी, तब तक उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल बज चुका होगा। उस समय तक पूरे प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का दौर शुरू होने का समय आ जाएगा। एक साथ दो बड़े चुनाव कराना प्रशासनिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से व्यवहारिक नहीं होगा। यही वजह है कि शासन और राजनीतिक गलियारों में यह पूरी तरह मान लिया गया है कि अब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव की समाप्ति के बाद ही नई सरकार की देखरेख में संपन्न कराए जा सकेंगे। आयोग के गठन का निर्णय लिए जाने के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार अब हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में इस मामले को लेकर चल रही सुनवाई में मजबूती से अपना पक्ष रखेगी, जहां इस संवेदनशील विषय पर अगली सुनवाई की तिथि 19 मई निर्धारित की गई है।
पूर्व में हुए पंचायत चुनाव का घटनाक्रम: एक नजर में
यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो वर्ष 2021 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का घटनाक्रम बेहद दिलचस्प रहा था। उस समय प्रदेश में पंचायत चुनाव कुल चार चरणों में संपन्न कराए गए थे, जिसके तहत 15, 19, 26 और 29 अप्रैल को मतदान हुआ था। इसके बाद दो मई को मतों की गणना की गई थी और परिणामों की घोषणा हुई थी। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के शपथ ग्रहण के बाद 26 मई को ग्राम पंचायतों की पहली ऐतिहासिक बैठक बुलाई गई थी। इसी प्रकार, 11 जुलाई को जिला पंचायतों और 19 जुलाई को क्षेत्र पंचायतों की पहली औपचारिक बैठकें आयोजित की गई थीं। परंतु इस बार स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम और कड़े आदेशों के मुताबिक, किसी भी स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव से पूर्व ओबीसी (OBC) आरक्षण की न्यायसंगत स्थिति तय करने के लिए एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया जाना अनिवार्य और अपरिहार्य कर दिया गया है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का सख्त 'ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला'?
‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला’ (Triple Test Formula) सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित किया गया एक बेहद महत्वपूर्ण, संवेदनशील और सख्त कानूनी मानक है। इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय निकायों और पंचायतों में ओबीसी वर्ग को मिलने वाले राजनीतिक आरक्षण को पूरी तरह से वैज्ञानिक आंकड़ों, वास्तविक जमीनी परिस्थितियों और प्रामाणिक डेटा के आधार पर सुनिश्चित करना है। इस व्यवस्था को सबसे पहले शीर्ष अदालत ने साल 2010 के ऐतिहासिक 'के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ' मामले में और बाद में साल 2021 के 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' फैसले में स्पष्ट रूप से अनिवार्य घोषित किया था। इस संवैधानिक व्यवस्था के तहत किसी भी राज्य सरकार के लिए स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले तीन अनिवार्य चरणों को पूरा करना कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है, ताकि पूरी चयन प्रक्रिया पारदर्शी, संतुलित और न्यायालय के समक्ष मजबूत बनी रहे।
ट्रिपल टेस्ट के तीन अनिवार्य चरण:
पहला चरण: राज्य सरकार को अनिवार्य रूप से एक समर्पित और निष्पक्ष पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना होगा, जो स्थानीय स्तर पर जाकर पिछड़ेपन की प्रकृति और उसके राजनीतिक प्रभावों का गहन अध्ययन करे।
दूसरा चरण: आयोग द्वारा स्थानीय निकायों वार एकत्र किए गए अनुभवजन्य (Empirical) और वास्तविक आंकड़ों के आधार पर ही आरक्षण का सटीक प्रतिशत तय किया जाए, ताकि सरकार का निर्णय किसी अनुमान पर नहीं बल्कि ठोस आंकड़ों पर आधारित हो।
तीसरा चरण: सरकार को यह हर हाल में सुनिश्चित करना होगा कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को मिलाकर दिया जाने वाला कुल आरक्षण किसी भी परिस्थिति में 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा को पार न करे।
आखिर क्यों जरूरी हुआ राजनीतिक आरक्षण के लिए 'ट्रिपल टेस्ट'?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मिलने वाला सामाजिक व आर्थिक आरक्षण तथा स्थानीय स्वशासन निकायों में मिलने वाला राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आरक्षण, दोनों पूरी तरह से अलग प्रकृति के विषय हैं। इसी मौलिक अंतर को रेखांकित करते हुए अदालत ने व्यवस्था दी है कि राजनीतिक आरक्षण को केवल पुराने या सामान्य अनुमानित आंकड़ों के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए बिल्कुल ताजा, प्रामाणिक और अद्यतन (Updated) डेटा होना जरूरी है।
अदालत का स्पष्ट मानना है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए सरकार के पास ठोस साक्ष्य होने चाहिए, ताकि आरक्षण का वास्तविक लाभ केवल जरूरतमंद और पात्र वर्गों तक ही पहुंचे। यदि कोई राज्य सरकार इस त्रिस्तरीय प्रक्रिया का पालन किए बिना आरक्षण तय करती है, तो संबंधित ओबीसी आरक्षित सीटों को स्वतः सामान्य श्रेणी (General Category) की सीट मान लिया जाएगा और चुनाव उसी आधार पर कराए जाएंगे। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश सरकार अब इस पूरी व्यवस्था को बिना किसी कानूनी खामी के लागू करने की दिशा में गंभीरता से कदम बढ़ा रही है।
जून के पहले सप्ताह तक पूरी होगी आयोग में नियुक्तियां
उच्च पदस्थ सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा गठित किए जा रहे इस समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का सेवाकाल या कार्यकाल शुरुआती तौर पर छह माह के लिए निर्धारित किया गया है। आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य योग्य सदस्यों की नियुक्ति की चयन प्रक्रिया को बेहद तेजी से अंतिम रूप दिया जा रहा है। प्रशासनिक हलकों में उम्मीद जताई जा रही है कि मई के अंत तक या फिर जून के पहले सप्ताह में आयोग के गठन से जुड़ी सभी औपचारिकताएं और नियुक्तियां पूरी कर ली जाएंगी।
नियुक्ति पाते ही यह आयोग पूरी सक्रियता के साथ जमीनी स्तर पर पहुंचकर पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति का विस्तृत अध्ययन शुरू कर देगा। जिन दूरदराज के क्षेत्रों या जनपदों में ओबीसी वर्ग से संबंधित विश्वसनीय और अद्यतन आंकड़े पहले से उपलब्ध नहीं हैं, वहां आयोग विशेष सर्वेक्षण (Special Survey) चलाकर नई डेटा रिपोर्ट तैयार करेगा, ताकि आरक्षण का निर्धारण पूरी तरह त्रुटिहीन और न्यायसंगत हो सके।
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